Sanyog se Viyog tak

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प्रणाम

टीम वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल है – संयोग से वियोग तक

तारक तीर्थंकर परमात्मा श्री महावीर स्वामीजी का जीवन ही तमाम मोक्ष इच्छुक आत्माओ के लिए बड़ी मिसाल है। परमात्मा का शासन इतना जयवंत है कि भवप्रपंचो की जाल से बाहर निकलने हेतु हमें विशिष्ट प्रकार से प्रेरणा मिलती ही रहती है।

एक प्रश्न हमेशा होना चाहिए की हमारी मुक्ति क्यों नहीं होती ?
मोक्ष जाना भी है या नहीं ?
मोक्ष को माना भी है या नहीं ?

ऐसे अनेक सवाल है लेकिन जवाब ढूंढने जायेंगे तो खाली हाथ ही वापिस लौट कर आएंगे। सही है ना ?

जवाब है – *संयोग का राग*

श्रुतप्रभावक मुनीराजश्री वैभवरत्न विजयजी म.सा. ने *संयोग* इस एक शब्द पर ही चातुर्मासिक प्रवचन दिए और उन प्रवचनों को पुस्तक स्वरुप में भी सजाया गया। जिसमे यही बात बताई गई है कि, जीव के पतन में मुख्य कारण यही बनता है की वह संजोगो के आधीन हो जाता है। *संजोग मूला जीवेण, पत्ता दुक्ख परंपरा* – संजोग ही जीव के लिए दुखो की परंपरा चलाने में कारणभूत बनते है।

संजोग दो प्रकार के होते है – सही और गलत। सही संजोग यानी कि जो जीव को भवसागर से बचाये और गलत संजोग वह है जो जीव को भवसागर में डुबोये। कभी कभी ऐसा भी होता है की गलत संजोग जीव को भवसागर से बचाने का हल्का आभास करवाता है किन्तु वह घातक ही होता है। वह थोड़ा सा धर्म दिखा कर अंत में दुगने जोर से जीव को भवसागर में फेंकता है।

सोचिये, क्या हमारे पास ऐसा भेद ज्ञान है जो हमें अच्छे और बुरे संजोगो की पहचान करवाए ? नहीं ? तो फिर कैसे मुक्ति मार्ग में आगे बढ़ेंगे ?

उपरोक्त संजोगो के प्रकार को जानना अतीव आवश्यक है।
प्रथम है अच्छे संजोग यानी की सुदेव सुगुरु सुधर्म
हम जिनकी आराधना करते है वह देव कौन है, गुरु कैसे है, धर्म कैसा है वह सोचना जरुरी है।
क्या हमारे देव ऐसे है जो रागी है, जिनके पास राग द्वेष के साधन या स्थान मौजूद है ? ऐसे किसी भी देव की भक्ति तो संसार वर्धक ही साबित होगी। जिनकी भक्ति होगी वैसी हमारी प्रज्ञा बनेगी। भक्ति उनकी करनी है जिसने राग द्वेष को ही तोड़ दिया है और वह है श्री जिनेश्वर परमात्मा। अब हम मिथ्या मार्ग में ही चलेंगे तो यह गलत संजोग होंगे।

गुरु कैसे हो ?
जो गीतार्थ हो – गीत (सूत्र) + अर्थ के जानकार हो, उत्सर्ग-अपवाद मार्ग के ज्ञाता हो, उपशम भाव के धारक हो, सदा प्रसन्नता के मालिक हो, अध्यात्म और तत्व से परिचित हो, मोक्ष मार्ग के लिए आवश्यक क्रियाओ में दृढ हो, जिनका एक लक्ष्य निर्धारित हो, पांच महाव्रत में अति चुस्त पालक हो – एक भी महाव्रत को कभी तोड़े नहीं, अपने शिष्यों के अभ्यास और चारित्र जीवन पर जिनका पूरा ध्यान हो, चतुर्विध संघ के लिए जो सतत कार्यरत हो और संघ को अध्यात्म की उच्च दिशा में जो आगे ले जा रहे हो – ऐसे सुगुरु की सेवा करना अच्छा संयोग है।

धर्म कैसा हो ?
श्री वीतराग प्ररूपित धर्म, जहाँ अहिंसा आदि व्रत, विनय आदि गुण, परगुण दर्शन की भावना हो, यथाशक्ति चारित्र मार्ग में आगे बढ़ने की भावना हो – यह है सुधर्म। इसके सिवाय जहाँ वैरवृत्ति, हिंसक प्रथा, शास्त्रों से विरुद्ध क्रिया है वह किसी काल में धर्म नहीं कहा जा सकता। भले ही परंपरा से चल रहा हो किन्तु जो कार्य हिंसक है वह कभी सत्य नहीं बन सकता। क्योकि *श्री अरिहंत परमात्मा और उनकी आज्ञा से बड़ा इस जग में कुछ भी नहीं है*

इस प्रकार सुदेव, गुरु, धर्म – सही संजोग है क्योकि यह हमें भवसागर से बचाने में समर्थ है।

अब – गलत निमित्त कौन है ?
एक शब्द में कहे तो *संसार*
संसार इस लिए गलत है क्योकि हमने इसे ही सही संजोग बना लिया है। हमारे मन में संसार भावना पड़ी रहती है। इसी संसार से भी अनंत पुण्यात्मा निकले है परंतु उन्होंने संसार को त्याज्य माना है, तभी वे यहाँ से बाहर नीकलकर सिद्ध बने। जबकि हमने हमेशा संसार का ही सपना सजाया और इसी वजह से यह संजोग सदाकाल से हमारी आत्मा के साथ जुड़ा रहा।

संजोग का उपयोग होते ही उससे दूर होना जरुरी है। बस में बैठकर कही जाए और मंझिल आने पर बस का त्याग करना ही पड़ेगा। हमारी गलती यही पर हुई है की हम संजोग से ही घिरे रहते है हमने संजोग का वियोग सहन नहीं किया। वास्तविकता यही है की संजोग और वियोग यह दोनों चलते ही रहते है। हमें जब संजोग प्राप्त होते है तब खुश हो जाते है और वियोग होने पर आकुल व्याकुल हो जाते है। जैन शासन इसी बात पर प्रकाश करता है की जो प्राप्त हुआ है वह दूर भी होगा। *उपन्ने इ वा, विगमेई वा, ध्रुवेई वा* – अफ़सोस यही है की हमने बस बाह्य क्रिया ही अपना ली लेकिन जो वास्तिवकता से अलिप्त रहना है वह हम नहीं अपना सके और इसी वजह से गलत संजोगो में ही हम उलझते रह गए।

अब, कुछ संजोग ऐसे भी है जो हमारे लिए उपकारी बन भी जाते लेकिन हमारी अज्ञानता की वजह से वही संजोग हमारे लिए घातक बन सकते है। यह बड़ी दिलचश्प बात है।
कैसे होते है यह संजोग ?
धर्म के क्षेत्र में मान, सम्मान, पद, प्रतिष्ठा आदि हमने प्राप्त कर लिए – एक बड़े धार्मिक व्यक्ति के स्वरुप में हम लोगो के सामने मौजूद है लेकिन सिर्फ बाहरी रूप में। आंतरिक स्वरुप में तो हम बिलकुल शून्य है। ऐसे समय में भी कई जीव होते है जो सुगुरु के संग से अपने आप को बदल लेते है और शुद्ध समकित मार्ग में अपने आपको आगे बढ़ा लेते है लेकिन कुछ जीव ऐसे भी होते है जो अपने आप को बस कुछ मर्यादित दायरे तक ही धार्मिक बनाते है तत्पश्चात वे शासनसेवा का विचार नहीं कर पाते।

अप्रतिम गुरु भक्ति करने वाले हम धर्मनेता गुरुदेव के लिए रात्रिभोजन तक नहीं छोड़ सकते यह कौन सा धर्म हुआ ? कौन से शास्त्र में लिखा है कि अनुकंपा से आगे बढ़ना ही नहीं है ? वर्षीतप, उपधान, मासक्षमण आदि बड़ी बड़ी तपस्या करने वाले हम क्या रात्रिभोजन भी नहीं छोड़ सकते ?

हमारी एक फिलोसोफी हो गई है कि, जितना हो उतना करना चाहिए। हम यह नहीं सोचते की 30 दिन तक जिसने आहार का त्याग किया है वह जीव क्या रात्रिभोजन त्याग नहीं कर सकता ? यह तो शायद अपने आप से छल करने की बात हो गई है। गुरुदेव का प्रवेश हो तब बड़े बड़े कार्य करने वाले शासन सेवक प्रवेश हो जाने के बाद रात को खाते है तो यह बिलकुल गलत और अनुचित कार्य ही है। हमने सिर्फ हमारी मर्जी का धर्म बना लिया है।

*चाहे कितना भी मैनेजमेंट करो और दिन रात खड़े रहकर धार्मिक प्रसंग पूर्ण करवाओ, यदि आप रात्रिभोजन करते हो तो आप अपने आपको श्रावक कहलाने के अधिकारी बिलकुल नहीं हो* – क्योकि यह जिनाज्ञा, गुर्वाज्ञा, शास्त्राज्ञा नहीं है।

समस्या का समाधान क्या ?
ज्ञान – हमारी तमाम धर्म क्रिया इसलिए गलत साबित हो रही है क्योकि हम श्री अरिहंत परमात्मा द्वारा बताये गए मार्ग से ही अनजान है। बस एक प्रवाह चलता है उसमे हम बहते जाते है। जन्म प्राप्त कर के अपना कुछ वजूद ही नहीं बनाया तो यह जन्म किस काम का ? प्रवाह में बहने से धर्म नहीं होगा, धर्म होता है सिर्फ प्रभु की आज्ञा का पालन करने से।

जो भी क्रिया करते है उसके पहले सोचो, समझो, जानो – प्रश्न करो की क्या यह मेरे परमात्मा की आज्ञा में है ? यह तमाम प्रश्न और उनके जवाब तभी मिलेंगे जब हम ज्ञान से परिचित होंगे।

संजोग – वियोग का ज्ञान इसलिए जरुरी है क्योकि संजोग होने पर जीव खुश नहीं होगा और वियोग होने पर दुःखी नहीं होगा। जैन शासन ऐसा उत्तम है कि वियोग होने पर भी हमें शक्ति देता है। वह शक्ति प्राप्त होती है ज्ञान से। चाहे कैसा भी दुःख हो ज्ञानी जीव अपनी गंभीरता से दूर नहीं जाते। अति शोक या अति हर्ष उनमे नहीं होता। वह जीव तमाम घटना और परिबलो को कर्मवाद, संजोग, वियोग आदि तत्वचिंतन द्वारा तोलते है और अपने लक्ष्य में ही आगे बढ़ते रहते है। कही इन तत्वचर्या का अभाव दिखे तो समझना चाहिए की ज्ञान की क्षति है।

यही हमारी कमी है की हम ज्ञान से दूर रहे है। नवतत्व, कर्मग्रंथ जैसे तत्त्व प्रदाता ग्रंथ हमने नहीं पढ़े, श्री आनंदघनजी – श्री यशोविजयजी आदि महापुरुषों की आध्यात्मिक रचनाओं को हमने देखा तक नहीं – मंत्रेश्वर नवकार मंत्र के संपूर्ण अर्थ तक हमने नहीं पढ़े और फिर धार्मिक नेता बने रहेंगे तो कल्याण नहीं होगा। पुण्यबंध होगा लेकिन वह पुण्य आगे जा कर पापानुबंधी बनेगा। धार्मिक कार्य अवश्य करने ही चाहिए यह तो शासन सेवा है किन्तु विचारशुद्धि नहीं होगी तो क्या करना ?

हम किसी और को मोबाईल थमाकर गुरुदेव के पास जाते है। वीर गुरुदेव हमारे मस्तक पर वासक्षेप कर रहे है और हम उस समय दो हाथ जोड़कर, सुंदर मुस्कराहट देते हुए मोबाईल वाले की तरफ देखते है। फिर वह फोटो घूमती है हर जगह और लाइन लिखी जाती है *गुरुदेव मुझे वासक्षेप करते हुए* – यह तो हमारा धर्म हो गया है। कौन सा आचार, कौन सा विचार ? कौन से शास्त्र में हमने धर्म के यह सब लेख पढ़े है ? बस, प्रवाह में चलते जाना है। नैसर्गिक और कृत्रिम भावो का परिचय ही नहीं रहा है हमें इसीलिए अच्छे संजोगो को भी हम गलत संजोग बना देते है।

संसार मन में भरा हुआ है – संयम जीवन शायद ग्रहण ना कर पाए लेकिन संसार तो मन से नीकालना ही है और यही है सच्ची गुरुभक्ति। सिर्फ इधर उधर दौड़ने से और फोटोग्राफी से धर्म नहीं होता। धर्म होता है आत्मा को जानने से, आत्मा को कलुषित विचारो से दूर हटाने से, आत्मा को कर्म के भार से हल्का बनाने की प्रक्रिया से और यह तभी होगा जब सम्यग्ज्ञान का साथ होगा। बिना ज्ञान के कितना भी पराक्रम कर लो वह शासन से बाहर ही गिना जायेगा।

क्या हम अब परिवर्तन का प्रयत्न करेंगे ? सब कुछ मुमकिन है
श्रुतप्रभावकश्री के शब्द है – जो मनुष्य बड़े बड़े पहाड़ो को तोड़कर रास्ता बना सकता है वह क्या अपने आत्मा पर लगे कर्मो का पहाड़ तोड़ने कुछ नहीं करेंगा ? सोच लो, जब तक जीवन है तब तक ही मृत्यु को महोत्सव बनाने की तक है। मरने के बाद संसारी लोग गुणगान कर लेंगे लेकिन स्वात्मा की सुरक्षा का क्या ?

एक मच्छर की पीड़ा सहन ना करने वाले हम नरक और तिर्यंच गति में कैसे दुःख सहन करेंगे ? या फिर हम जिनाज्ञा से दूर हो कर परगति की बाते ही नहीं मानते ???

टीम वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल है – संयोग से वियोग तक पसंद आये तो दो नियम लीजिये

1. यथाशक्ति छोटी शुरुआत करते हुए भी रात्रिभोजन से दूर रहना है।
2. याद रहे या ना रहे रोज 1 गाथा अवश्य पढ़नी ही है।

वीतराग की आज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो त्रिविधि मिच्छामि दुक्कडम

Team veer gurudev

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