Sambhal ja sansari

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वीर गुरुदेव की तरफ से आज का आर्टिकल है – संभल जा संसारी 

 
परमतारक परमात्मा करुणासागर श्री महावीर स्वामीजी की विराट यात्रा अनेक जीवो के लिए प्रकाशस्तंभ के जैसे बना है। इस महायात्रा में तमाम अनुकूलता एवं प्रतिकूलता में प्रभु वीर ने सिर्फ आत्मसाधना को ही प्राधान्य दिया है। उन तमाम प्रसंगो के सहारे, उन प्रसंगो में आध्यात्मिक ऊंचाइयों को दृश्यमान करते हुए आज सदिया बीत जाने के बावजूद अनेक आत्माओ को इस यात्रा से सुनहरे सोपान सजाने में सहायता प्राप्त होती रही है। 
 
परमात्मा का परम उपकार यही रहा है कि, उन्होंने हमें अदभुत सम्यग्ज्ञान की धरोहर दी है। परमात्मा की अनुपस्थिति में यह ज्ञान ही परमात्मातुल्य बनते हुए हमें सत्य और सत्व प्रदान करता है। ज़िंदगी के तमाम अच्छे-बुरे समय में बिना किसी चंचलता के, गंभीरता को सदा आत्मसात करते हुए संकल्प और समर्पण की भावनाओ को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण बल सम्यग्ज्ञान ही प्रदान करता है। इसी ज्ञान के सहारे कई भव्यात्मा मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ रहे है। 
 
लेकिन, हमें सदैव अपनी आत्मदशा को देखते रहना है। 
सवाल होना चाहिए कि, 
– मेरा मोक्ष कब ?
– कब तक मैं संसारवन में भटकता रहूँगा ?
– अनंतकाल की यात्रा कब पूर्ण होगी ?
– संसार से मुक्त नहीं हो पाने का कारण क्या है ?
– क्यों विमल लक्ष्य की तरफ विराट यात्रा की शरुआत नहीं हो रही ?
 
*जवाब तब प्राप्त कर सकते है जब सवाल पैदा हो। हमारी कमनसीबी ही यह है कि, हमें मोक्ष मार्ग के सवाल ही नहीं होते।*
 
जवाब की खोज करनी है तो पहले स्व की खोज करनी पड़ेगी। संसार से मुक्त होना है तो संयमयुक्त बनना पड़ेगा। 
-: संयम यानी क्या ? 
चारित्र जीवन ग्रहण करना ही है किन्तु जब तक चारित्र प्राप्त नहीं होता तब तक चारित्र की पूर्वतैयारी करना भी संयम की शुरुआत है। 
 
सरल भाषा में संयम का अर्थ है – मर्यादा 
जब तक हम अपने कर्मो को मर्यादित नहीं करेंगे तब तक मुक्ति पाना असंभव है। किन्तु हमारी सब से बड़ी भूल ही यही है कि हमने मर्यादा को कभी नहीं देखा। जिसने भी मर्यादा का उल्लंघन किया वह दुःखी हुआ है। कर्मवश मर्यादा से आगे जाना भी पड़े तब भी सुगुण जीव अपने आपको सम्हालते है और शुभ भावो से अपने मूल मार्ग में लौट आते है। लेकिन जिन्होंने अपनी मर्यादा का सम्मान नहीं रखा वह निश्चित ही कर्मो की परीक्षा में फँस जाते है। 
 
कर्मसत्ता द्वारा बिछाये हुए जाल से बाहर निकलना आसान नहीं है। इसलिए हम संसारी लोगो को अति आवश्यक रूप से हमारे जीवन को सुधारना ही होगा। आज नहीं तो कल, कभी भी, परिवर्तन आवश्यक है। इसी परिवर्तन को हम संसार और संयम के मध्य का प्रयास कहेंगे। 
 
विरति शायद दूर है लेकिन वैराग्य तो जीव का स्वाभाविक गुण है। गुण से अवगुण और स्वभाव से विभाव का परिवर्तन होने से जीव संसारचक्र में गोल गोल घूमता ही जा रहा है और कूपमंडूक बन चूका है। इस भ्रामक दुनिया से बाहर आना ही नहीं चाहता। कुए का मेंढक तो शायद अपना आग्रह छोड़ सकता है लेकिन जिसके मन में संसार बस चूका है उसे कैसे परिवर्तन का मार्ग मिलेगा ? 
 
हमारे लिए भाग्य का पुण्य है क्योकि वीतराग प्ररूपित धर्म हमें प्राप्त हुआ है। तो फिर, क्यों प्रमाद करना ? प्रति क्षण आत्मजागृति में ही बीते यही तो श्रावक का प्रथम गुण है। यदि अब तक हम इन भावो से नहीं जुड़े है तो शीघ्र परिवर्तन करना पड़ेगा। मोक्ष बोलने में और माँगने में सरल है, अपनाने में नहीं। अनेक साधना का बल जुड़ेगा तब मोक्ष प्राप्त होगा। 
 
संसारी से संयमी की यात्रा दुष्कर नहीं है, आसान है। अभी भी समय है क्योकि आयुष्य है, बल है, पुण्य है, योग है कमी है सिर्फ विचारो की, शुद्धि की, जागृति की। 
 
संभलना तो पड़ेगा ही हे संसारी !
अब नहीं तो कब ? 
 
“अंजलीगयं व् तोयं, गलंतमाउं न पिच्छन्ति”
हाथ में से पानी की भाँति आयुष्य बहता ही जा रहा है। सोचो, कब हमें अपने जीवन में अध्यात्म का सुनहरा सबेरा प्रगट करना है ? 
 
गलती हुई है तो प्रायश्चित रूपी हथियार भी है। 
युद्ध में राजा घायल होता है तब उपचार करते हुए वापिस विजयी बनने मैदान में भागता है। अगर वही राजा सोचे की, अब में घायल हूँ, अब मुझ से कुछ नहीं होगा तब किसी काल में वह अपने राज्य की रक्षा नहीं कर पायेगा और विरोधी सैन्य उसके राज्य को जीत कर तहसनहस कर देगा। 
वैसे, हम से कोई दोषपूर्ण कार्य हुआ है तो आर्तध्यान करते हुए बैठने से कोई फायदा नहीं है अगर ऐसा किया तो कर्मसत्ता अपने सैनिको को विविध रूप से हमें परेशान करने भेजेगी और धीरे धीरे हमारे गुणों का सर्वनाश करते हुए हमें दुर्गति की ओर अग्रेसर कर देगी। 
 
इसीलिए तुरंत जागृति प्राप्त करनी ही पड़ेगी और मौत को जीतकर मोक्ष हाँसिल करने के लिए परिश्रम करना ही पड़ेगा। इसी परिश्रम के लिए हमें अपने आप को सम्हालना ही है। इसलिए कहते है “संभल जा संसारी”
 
सम्भलना कैसे है ?
विचार शुद्धि को अपनाना है। जहाँ कोई भी ऐसी बाते होती है जिससे मन की समाधि में परेशानी हो रही हो, उन बातो से तुरंत हट जाना है। हट जाना यानी किसी का अपमान करना नहीं बल्कि मन को कषाय में व्यस्त होने से रोकना। 
 
ऐसी आत्म जागृति प्राप्त होने से जीव सदैव अपने आत्मा को स्फटिक सा निर्मल बनाने की कोशिश में तत्पर रहता है और इसी क्रिया से जीव मोक्ष मार्ग में अपनी गति बढ़ाता रहता है। यह भाव सिर्फ सम्यग्ज्ञान से ही प्राप्त होंगे। अतः ज्ञान का उपयोग करना ही जीव की असली पहचान बन जाती है। इसलिए पूज्य वीर गुरुदेवो के सान्निध्य को अपनाते हुए ज्ञान प्राप्त करने के प्रयासों में जुट जाना ही उचित होगा। 
 
 
वीर गुरुदेव की तरफ से आज का आर्टिकल है – संभल जा संसारी 
पसंद आये तो दो नियम लीजिए 
 
1. दैनिक कम से कम 10 मिनिट स्वात्मा के लिए एवं 10 मिनिट शासनसेवा के लिए देंगे। 
2. आर्थिक रूप से कमजोर साधर्मिक भाई बहनो की यथाशक्ति भक्ति करेंगे। 

 

 
Team veer gurudev
 
 
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