safar – 31st october

*सफर*

कालानुकाल यह जीव निरंतर संसार मे परिभ्रमण करता ही रहा है।

द्रव्य वही रहा, पर्याय बदलते रहे किन्तु गुणों का जो विकास आत्मा के स्वभाव में घट है और विशेष रूप से सोचे तो आत्मा के अधिकार में है उन गुणों का आगमन कभी सम्भव नही हो पाया।

सत्य, सामर्थ्य, स्वरूप को जानने की चाहना रखने वाले आत्मा को इस गुण ग्रहण की स्थिति को प्राप्त करना अति आवश्यक है।

जैनशासन में हुए अनेक वीर गुरुदेवो ने अपने साधना काल से यही साबित किया है कि स्वरूप की सच्ची पहचान के बिना की जाती प्रवृत्ति मिट्टी की लकीर के समान बनेगी। जबकि शुद्ध सात्विक विचारधारा के माध्यम से हो रही क्रिया पत्थर की लकीर बनेगी।

फैंसला हमे करना है कि समय का सदुपयोग हो या समय व्यर्थ में गँवाया जाए।

मोक्ष यात्रा का यह सफर तभी सार्थक होगा जब स्वयं की पहचान शुरू हो। अन्यथा यह अंग्रेजी का सफर बनकर रह जायेगा।

*टीम वीर गुरुदेव*
*विचारशुद्धि का साम्राज्य*

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