Guruvara me Pasiyantu – Guru purnima 2017

*गुरुवरा मे पसियन्तु*
 
टीम वीर गुरुदेव की ऒर से आज का आर्टिकल है – *गुरुवरा मे पसियन्तु*
 
परमतारक परमात्मा श्री महावीर स्वामीजी का शासन अति शोभायमान है और इस महान शासन को तेजवंत, वेगवंत बनाने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है हमारे पूज्य साधु साध्वीजी भगवंतों का। 
 
समय समय पर अनेक महात्माओं ने अदभुत शासन प्रभावना करते हुए जिनशासन का नाम जग में रोशन किया है। आज के मंगलदिन पर हम पूज्य गुरुदेवों की उपासना का अध्याय जानेंगे। 
 
जैन शासन में टीम वीर गुरुदेव ने 10 वर्ष पहले से ही गुरु पूर्णिमा के पावन दिन पर गुरुदेवों की यशोगाथा का गान शुरू किया। शुद्ध सत्वशाली और सम्यग्ज्ञान की सतत आराधना में रत पूज्य गुरुदेव भगवंतों की भक्ति में हम सदैव तत्पर है। 
 
गुरु के विषय मे संसार में अनेक सुंदर बातें हमें प्राप्त होती है। जैनशासन में गुरुदेव का जो महत्व बताया गया है वह और कहीं नहीं बताया गया। 
 
तत्वत्रयी में गुरु ही है जो अन्य 2 तत्वों की पहचान करवाते है, इसलिए गुरु का महत्व अधिक गिना जाता है। गुरु ही धर्म करवाने द्वारा देव से मिलवाने में समर्थ है। 
 
यहाँ तक की स्वयं की अधोगति जानने के बावजुद अपने शिष्यों का कल्याण हो रहा है यह सोचकर भी कल्याणप्राप्ति के स्थान अपने शिष्य परिवार के साथ जाते है और तमाम शिष्यों को अंतिम निर्यामना करवा कर मोक्ष तक पहुँचाते है। यही तो है सद्गुरु की पहचान। 
 
*गुरु कैसे होते है ?*
गुरु स्वयं सतत आत्म स्वभाव में लीन रहते है और अपने शिष्यों को भी आत्म स्वरूप की पहचान करवाते है। 
 
गुरु शिष्य के शरीर की नहीं बल्कि आत्मा की भी चिंता करते है। इसीलिए प्रति क्षण सही तरीके से आत्म कल्याण की प्रक्रिया में रहने का अभ्यास करवाते है। 
 
गीतार्थ गुरु की शरण से शिष्य निश्चित रूप से मोक्ष की सफर प्राप्त कर सकता है। यह गीतार्थता होना भी अति आवश्यक है। अन्यथा कल्पसूत्र में चंद्रमा के स्वप्न के समान जो दृष्टांत बताया गया है वैसे अगीतार्थ गुरु स्वयं के साथ शिष्य को भी भवसागर में डुबोते है। 
 
– जो कभी पर में नहीं जाते,
– कौन किससे मिलता है इस विषय मे जिनको रुचि नहीं,
– शिथिलाचार से जो कोशो दूर है,
– स्वदेह की कमजोरी से वश हो कर जो शास्त्रों के पदार्थो से अलग व्यवहार नहीं करते,
– जिसे पद प्रतिष्ठा पैसे का मोह नहीं,
– पांच महाव्रत का जो प्राणों से ज़्यादा पालन करें,
– महायात्रा की शुरुआत से जीवनयात्रा के अंत तक *जो श्रद्धा से लिये गए और विश्वास से दिए गए रजोहरण की गरिमा को बनाये रखते है,*
– जो अखंड ब्रह्मचर्य के धारक है,
– जो मर्यादा का उल्लंघन नही करते
– जो स्व में स्थिर है और प्रसन्न है
– प्रतिक्षण जिनकी तत्वचर्या में व्यतीत हो रही है
– जो राग द्वेष से पर है
– जो रचना से ज़्यादा साधना को जीवन मानते है
– जिनका उपादान ही अति शुद्ध है
 
यह है गीतार्थ गुरु भगवंत
 
ऐसे गुरुदेव होते है जैनशासन में। 
 
सच में, ऐसे महान भगवंतों से हराभरा है यह शासन और उनके ही सान्निध्य में हम सब को मोक्ष मार्ग की जानकारी प्राप्त होती है। 
 
जब भी शासन में संकट आते है तब तब हमारे पूज्य गुरुदेवों ने विशिष्ट कार्यो के द्वारा संकटों को दूर किया है और स्वपर को कल्याण मार्ग बताया है। 
 
*विश्वपूज्य प्रातः स्मरणीय श्री राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा*
एक समय ऐसा था; 
 
– जब अनेक जगह शिथिलाचार फैला हुआ था,
– साधु का जीवन यति के जैसे बन गया था
– संघ समाज ट्रस्ट के काम यति करने लगे थे
– श्रावक श्राविकाओं को वे यति डराने लगे थे
 
ऐसे विषम संजोगों में सही मायने में आत्म कल्याण करने हेतु जिन्होंने दिक्षा ली थी, वह युवा मुनि *श्री रत्नविजयजी* ने चुस्त चारित्र जीवन का शंखनाद फूंका। आगे जा कर वे जिनशासन के तीसरे और आखरी क्रियोद्धारक *श्री राजेन्द्र सूरीश्वरजी* बने। और शुद्ध व चुस्त चारित्र मार्ग के प्ररूपक बने। 
आज भी पूज्य गुरु भगवंत उन्हें शुद्ध चारित्र पालक और सुषुप्त क्रिया मार्ग को ज्वलंत बनानेवाले सद्गुरु के स्वरूप में याद करते है।
 
यही तो है सद्गुरु की पहचान। 
वे अपने शिष्यों को सिर्फ शिष्य नहीं बनाते बल्कि शिव बनाने की राह दिखाते है। यदि शिष्य उन्मार्ग ग्रहण करें तो निसंकोच यथोचित शिक्षा भी देते है। 
 
ऐसे ही गुरुदेव ने करीब 250 आसपास शिष्यो को वापिस संसार में भेजा था क्योंकि वहाँ सात्विक जीवन का अभाव था, या कह सकते है कि सात्विक समझ का अभाव था। 
 
बिना सम्यग्ज्ञान के जीव सम्यग जीवन कैसे जीयेगा ?
 
इसीलिए कहा जाता है, 
 
*दिक्षा के बाद शिक्षा देनी पड़े, इससे बेहतर है कि शिक्षा के बाद दिक्षा दी जाये*
 
यह कार्य गीतार्थ गुरु ही जान सकते है। 
 
जिनशासन ने अनेक महात्माओ की देन दी है। जिन्होंने शासन रक्षा हेतु अनेक कार्य किये। 
 
ग्रंथ सम्राट श्री हरिभद्र सूरीश्वरजी, कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचंद्राचार्यजी, अध्यात्म योगीराज श्री आनंदघनजी, महोपाध्याय श्री यशोविजयजी, श्री देवचन्द्रजी, श्री चिदानंदजी आदि अनेक अनेक महात्माओं ने सद्गुरु के स्वरूप में हमें उत्तम विरासत दी है। 
 
इस एक सदी में भी शासन में अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया और हम सब पर विराट उपकार किया। 
 
युगप्रधान आचार्यसम पूज्य गुरुमा श्री चंद्रशेखर विजयजी महाराजा। जिन्होंने शुद्ध चारित्र की एक बड़ी मिसाल बनाई। ऐसे महात्मा जिनके चाहनेवाले लाखों है। अपने सात्विक प्रवचनों से जिन्होंने शासन में विशिष्ट प्राण डाले। ऐसे सद्गुरु की शरण से ही अनेक जीवों को मोक्ष मार्ग प्राप्त हुआ।
 
टीम वीर गुरुदेव के प्रेरणादाता राष्ट्रसंत आचार्य देव श्री जयंतसेन सूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य श्रुतप्रभावक मुनीराजश्री वैभवरत्न विजयजी, जिन्होंने सांसारिक अवस्था मे पूज्य गुरुमा चंद्रशेखर विजयजी महाराजा के सान्निध्य में अभ्यास किया है, 
 
मुनीवर ने दिक्षा जीवन की शुरुआत से ही सम्यग्ज्ञान का अभ्यास किया। यह ज्ञानयात्रा आज तक निरंतर जारी है। 
 
अनेक सूरी भगवंतों ने जिसे सराहा है ऐसी पूज्य राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा की अद्वितीय रचना *श्री अभिधान राजेन्द्र कोष* का अति गहन रूप से अभ्यास करनेवाले एकमात्र साधु भगवंत
 
मुनीवर का सान्निध्य ही ऐसा अजोड़ है कि समीप में रहते जीवों का जीवन परिवर्तन हो जाता है। 
 
इसका बड़ा उदाहरण है कि उनके साथ अभ्यास कर रहे मुनीवर दिक्षा जीवन के अल्पकाल में ही प्राकृत व संस्कृत भाषा में बात कर सकते है। यह मुनीवर कि ट्रेनिंग का ही फल है की अजैन ब्राह्मण ने दिक्षा ले कर उनके साथ अभ्यास किया और आज अतिचुस्त साधु के स्वरूप से जैन समाज उनको जानने लगा है – *मुनीराजश्री शंखेशरत्न विजयजी*
 
ऐसे गुरुदेवों के उपकार हम पर सदा रहे है तभी हम अपने स्थान पर गौरव प्राप्त कर रहे है। 
 
यह परम उपकार सभी जीव को प्राप्त हो यही मंगल कामना। 
 
टीम वीर गुरुदेव की तरफ से आज का आर्टिकल गुरुवरा मे पसियन्तु पसंद आये तो दो नियम लीजिये
 
1. हमारे गीतार्थ गुरु जहाँ भी हो वहाँ वर्ष में दो बार अवश्य जाएंगे। 
 
2. पूज्य साधु साध्वीजी भगवंत की वैयावच्च में सदैव तत्पर रहेंगे। 
वीतराग की आज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो त्रिविधे मिच्छामि दुक्कडम 
 
– *टीम वीर गुरुदेव*
Facebook.com/veergurudev

 

 

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