Eklavya-3

photogrid_1476370030042

वीर गुरुदेव फाउंडेशन की ओर से आज एकलव्य में विषय है – भ्रामकता का भ्रम

आर्य संस्कृति में गुरु का सम्मान बहुत ऊँचा रहा है। गुरु के जीवन को अपना आदर्श बनाकर अनेक शिष्य भव सागर से पार हो गए। कभी कभी गुरु को भी शिष्य पर विशेष लगाव रहता है और इस वजह से शिष्य अपने गुरु के कृपा पात्र बन जाता है। शिष्य गुरु को इतना चाहता है कि, उनके लिए अपना जीवन तक दे देता है। ऐसी अनेक वीरगाथा से यह संस्कृति समृद्ध है।

आज ऐसे ही एक गुरुप्रेमी शिष्य की बात करेंगे :-
एक संत थे, बहोत ही निर्मल मनवाले और पवित्र जीवन वाले। कभी किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखना, यह उनके जीवन का उद्देश्य था और उनके ऐसे ही उत्तम आचार से उनका सम्मान चारो दिशा में बढ़ता रहता था। हर जगह उन संत की तारीफे होने लगी। उनके उपदेशो से बोध प्राप्त कर अनेक लोग उनके शिष्य बने और सन्यास ग्रहण किया। उन संत की भारी ख्याति को देख कर कुछ संत ईर्ष्या से जलने भी लगे। उन सब सन्यासियो ने मिलकर उन ज्ञानी संत को नुक्सान पहुचाने की योजना बनाई। एक के बाद एक अनेक तरह के नुस्खे अपनाये लेकिन कभी सफल नहीं हुए।

ज्ञानी सदा अपनी आत्म मस्ती में मस्त रहते है जबकि अज्ञानी सदा दुसरो को देखकर उलझते रहते है। यहाँ वह तमाम सन्यासी ईर्ष्या की चिता में ज़िंदा जलते रहते थे। उनकी व्यथा उनके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी। उन्होंने ज्ञानी संत के भक्तो को परेशान करना शुरू कर दिया। उन्हें उन संत के बारे में गलत बाते कहने लगे। लेकिन उन शिष्यो ने विनय धर्म का पालन दिखाते हुए उनकी बातो को अनसुना कर दिया। सन्यासी ने शिष्य को अनेक प्रकार से समझाया किन्तु शिष्य ने नम्रता से यही जवाब दिया की आप मुझ से सन्यास पर्याय में एवं उम्र पर्याय में बड़े है तो आप जैसे महात्मा को किसी की निंदा करना भी शोभा नहीं देता। इस बात से सन्यासी और भड़क गए। अब तमाम सन्यासी ने मिलकर एक वृद्ध सन्यासी को नेता बनाया और किसी भी तरह ज्ञानी संत की प्रसिद्धि रोकने का निर्णय लिया। वृद्ध सन्यासी ने भी उसी प्रकार लोगो में भ्रामकता फ़ैलाने की कोशिशें की किन्तु लोगो ने उनको वृद्ध जानकर उनका विनय किया किन्तु ज्ञानी संत का साथ नहीं छोड़ा।

दिनबदिन विकट होती जा रही परिस्थितियों की जानकारी ज्ञानी संत को मिली। उन्होंने सोचा मेरा ही दोष है की में बड़े बड़े सन्यासी को चुभ रहा हु। वे तुरंत उन सन्यासियो के पास गए, वृद्ध सन्यासी से कहने लगे की आप मेरी वजह से अपना मन व्यथित न करे। मुझे कोई नाम नहीं चाहिए। संतो का कार्य सिर्फ अच्छे कार्य करना है, नाम की कामना संत नहीं करते। इसलिए आज से में और मेरे शिष्य अज्ञातवास में ही रहेंगे। कुल 3 साल तक अज्ञातवास में रहने के बाद अन्य सन्यासी के आचारो से त्रस्त ऐसे भक्तो ने पुनः उन संत की खोज शुरू की और उन्हें ढूंढ के फिर से अपना गुरु बनाया।

हमें यही सीखना है की, चाहे कुछ भी हो जाए हमें अपने गुरु की निंदा करने वालो से दूर ही रहना है। ऐसे ही एकलव्यों से भरपूर यह आर्य संस्कृति है। धन्य है इस संस्कृति को…

Team veer gurudev

www.veergurudev.com
facebook.com/veergurudev

Download pathshala app from play store – veergurudev pathshala
Click here –
https://play.google.com/store/apps/details?id=com.veergurudev.pathshala

About the Author

Leave a Reply

*

captcha *