Eklavya-1

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एकलव्य

आज से हमारा एकलव्य अध्याय शुरू हो रहा है – जिसमे ऐसी गुरुभक्ति की बाते की जायेगी जो हमने कभी भी सुनी ही नहीं। उत्तम गुरु भक्ति कर के भी साइलेंट रहने वाले शिष्य यानी की एकलव्य आज भी मौजूद है, उनके विषय में टीम वीर गुरुदेव की ओर से कुछ बाते जानेंगे।

आज बात होगी ऐसे शिष्य की जिसने गुरु को बचाया।
हां, आश्चर्यकारी बात है किन्तु सत्य है। यह घटना है राजस्थान के एक शहर की। गुरुवर के एक शिष्य थे जो की ज्ञान व् संयम आराधना में उत्कृष्ट थे। उनकी विशाल संयम आराधना से सहज ही उनके बोल सत्य साबित हो जाते। लेकिन वे सदा अपने स्वाध्याय में ही रत रहते। कोई उनके पास जाता तो बस नवकार का जाप करने का ही कह देते।

उनकी प्रतिभा देखकर उनके गुरुदेव ने उन्हें दूसरे नगरो में विहार करने को कहा। गुर्वाज्ञा होते ही वे मुनीवर अलग क्षेत्रो में विहार कर के उत्तम शासन प्रभावना करने लगे। बड़े वर्षो के अंतराल के बाद गुरु शिष्य का मिलन हुआ राजस्थान के नगर में। दोनों एक दूसरे से मिलकर अत्यंत प्रसन्न हुए। लेकिन शिष्य ने देखा की गुरुदेव का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उपचार करने पर भी कोई सुधार नहीं हो रहा था। तबीब ने तो साफ़ कह दिया अब अंतिम समय करीब है।

शिष्य ने खुद गुरुदेव से कहा की आप पर किसी ने सामान्य विधि की है। आपकी आज्ञा हो तो में उपाय करू। गुरुदेव ने प्रश्न किया की, आप तो इन सब में बिलकुल नहीं मानते तो क्यों उपाय का पूछ रहे हो। शिष्य ने कहा की, हां में इन सब व्यर्थ क्रियाकांड में नहीं मानता लेकिन उपाय हो जाने के बाद में सत्य प्रगट करूँगा। गुरुदेव ने आज्ञा दी। शिष्य ने कुछ विशिष्ट जाप शुरू किए और देखते ही देखते गुरुदेव का स्वास्थ्य ठीक होने लगा। 20 मिनट में ही गुरुदेव बिलकुल स्वस्थ हो गए और उनके चेहरे पर ताजगी दिखने लगी।

शिष्य को दूसरे नगर विहार कर के जाना था अतः उपाय पूर्ण होते ही शिष्य ने कहा की आप आज्ञा दीजिये ताकि में विहार करू। गुरुदेव ने पूछा की कौन से जाप किये जो में एक महीने से बीमार था और 20 मिनट में ठीक हो गया। गुरुदेव के बड़े दबाव से वश हो कर शिष्य ने खुलासा किया की “गुरुदेव मैंने कोई जाप किया ही नहीं, मैंने तो 20 मिनट बस आपका नाम लिया और ह्रदय से प्रार्थना की थी कि मेरे गुरुदेव का स्वास्थ्य ठीक हो जाए” यह प्रत्युत्तर सुनकर गुरुदेव की आँखे खुली ही रह गई। उन्होंने कहा की, मेरे साथ वर्षो से रहते बाकी शिष्य भी रोज मेरे लिए प्रार्थना और दवा आदि सब करते हे लेकिन में ठीक नहीं हुआ लेकिन आप सिर्फ एक दिन के लिए मेरे पास आये और 20 मिनिट में मुझे ठीक कर दिया यह कैसे हुआ ?

शिष्य ने सुंदर जवाब दिया – गुरुदेव उन शिष्यो के बारे में कुछ कहना मेरी लायकात नहीं है लेकिन इतना कहूंगा की मैंने आपको भगवान माना है तो मेरे जाप और ध्यान में आपकी प्रतिभा पहले दिखेगी। आपको कुछ हुआ ही नहीं था बस किसी ने “बीमार बीमार” बोल कर आपको मन से बीमार बना दिया। और आपके प्रभाव के आगे हलकी विधि की कोई शक्ति नहीं टिक पायेगी। मेरे लिए आप ही सर्वोपरि है और रहेंगे।

शिष्य ने विनंती की, यह सब बाते किसी को ना कहे। यह कहकर गुरुदेव की आज्ञा ले कर शिष्य ने विहार कर लिया और उस वक्त गुरुदेव के कमरे के बाहर जो भी लोग खड़े थे उन सब को आज तक यह सवाल है की उन शिष्य ने गुरुदेव का स्वास्थ्य कैसे ठीक कर दिया ???

यह एकलव्य आज भी जिनशासन की उत्तम प्रभावना कर रहे है। इन्होंने हमें सिखाया है की मानसिक विचारों के आधीन रहने के बदले विचारो के विजेता बनना चाहिए। तब कोई भी तंत्र, मंत्र, यंत्र आदि की हमें आवश्यकता नहीं है। यह शासन सत्वशाली विचारों का दाता है, चंचल विचारबुद्धि के लिए यहाँ स्थान नहीं है।

धन्य है ऐसे वीर शिष्य को, एकलव्य को,
अहो जिनशासनम्

– टीम वीर गुरुदेव

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