Bawal

bawal
 
बवाल
 
टीम वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल है बवाल। 
 
“नमोस्तु वर्धमानाय स्पर्धमानाय कर्मणा”
 
उन वर्धमान को, उन महावीर को वंदन है जिन्होंने कर्मो के साथ स्पर्धा की। हम उनको ही मानते है तो हमारी स्पर्धा भी कर्मो के साथ होनी चाहिए। 
 
स्व को छोड़कर बाह्य संसार से हमने नाता जोड़ रखा यह हमारी गलती है। इसी बाह्य स्वरुप को देखने के आशय में हमने स्व के सत्य स्वरूप को एवं स्व के अंतिम स्थान से मुंह मोड़ लिया है। जब भी जीव स्वात्मा के ध्यान को छोड़कर पर में गया है तब तब उसे भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। यह नुक्सान आत्मगुणों से दूर होने रूप होता है और इन छोटे छोटे नुक्सान से मुक्ति का मार्ग दूर होते जा रहा है। मोक्ष तो अभी योजनों दूर है किन्तु उसे प्राप्त करने का मार्ग हमारे लिए दुर्लभ होता जाएगा। 
 
बाहरी परिबलो को देखने की यही आदत जीव की अनंत काल से रही। स्व में ध्यान केंद्रित नहीं किया इसीका फल है भवभ्रमण। ज्ञानीजन तो कहते है की केवलज्ञान या मोक्ष पाने की इच्छा भी जीव नहीं रखता, वह तो सिर्फ स्व ध्यान में रमण करता है। तभी आत्मा के गुणों का ऐसा बड़ा विकास होता है की धीरे धीरे तमाम दुर्गुण नष्ट होते है और जीव को सहज ही केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। केवलज्ञान की प्राप्ति हो यह विचार करते रहना भी विकल्प है, जब की उस स्थान तक पहुचना हो तो तमाम विचारो का त्याग करना होता है। मन शुन्यावकाश होना चाहिए। अब जरा सोचिये, क्या हम इस स्थान के 1% भी ध्यान में है ? नहीं. 
 
हमने सिर्फ पर को देखा – धार्मिक प्रसंगों में भी हमने पर को देखा। यहाँ तक की पूज्य गुरु भगवंतो को भी हमने हमारे बाहरी स्वभाव में जबरदस्ती जोड़ दिया। कभी कभी हमारी यही आदत बड़ी मुश्किल भी कर सकती है। ऐसी ही एक सत्य और विचारणीय घटना :-
एक व्यक्ति ने उत्तम भावो से दीक्षा ली। शुद्ध चारित्र पालन और ज्ञान उपार्जन हेतु उन्होंने कुछ वर्ष तक मौन रहने का निर्णय लिया। वो जहा विहार करते वहां उनके परिवार वाले भी दर्शन हेतु जाने लगते लेकिन वे मुनिवर किसी से बात भी नहीं करते थे। मुनिवर के एक सांसारिक रिश्तेदार उन्हें वंदन करने हेतु नहीं गए तब दूसरे लोगो ने उन्हें कहा की आप कैसे अभिमानी हो जो मुनिवर को मिलने नहीं गए। वह भाई गुस्से में आ कर बोलने लगे जब उन्होंने मौन ले रखा है और बात तक नहीं करते तो जाने से क्या फायदा। 
 
यह घटना भले सामान्य हो किन्तु हमें सोचना चाहिए ऐसी छोटी बातो में हम बवाल करते रहेंगे तो कैसे विनय धर्म प्रगट होगा। हमारे व्यवहार निभाने के चक्कर में हम पूज्य गुरु भगवंतो को भी परेशान कर देते है। 
 
– बात बात पर किसी से भी लड़ाई करने की आदत है बवाल 
– बेवजह मन को क्रोधित बनाने का मार्ग है बवाल 
– विषय वस्तु को समझे बिना चिल्लाते रहना है बवाल 
– अपनी ही मान्यता को पकड़ के लड़ते रहना है बवाल 
– आग्रह दुराग्रह में तबदील होते हुए कदाग्रह बने वह स्थिति है बवाल 
 
सामने वाली व्यक्ति की बात को हम समझते नहीं। किसी भी चर्चा में अपनी बातो को पकड़ कर रखना गलत है। विकल्प का त्याग ही साधु जीवन है। ज्ञानीजन स्वध्यान में समता रस का पान करते है। बाहरी द्रव्यों में उन्हें कोई रस नहीं है और इसी समता का अनुभव उनके चेहरे पर दीखता है। इसीलिए किसी व्यर्थ चर्चा में ज्ञानीजन भाग नहीं लेते। उनका लक्ष्य मोक्ष है और कर्म तोड़ने हेतु वे सिर्फ स्व में रहते है। 
 
हम उन भव्य जीवो जैसे बिलकुल नहीं बन सकते लेकिन व्यर्थ कथाओ से अवश्य दूर रहना चाहिए। किस जगह क्या हुआ, कौन सी जगह पर क्या हो रहा है आदि अनेक व्यर्थ परेशानिया लेते हुए हम दिन रात दौड़ते रहते है। एक क्षण का भी प्रमाद नहीं करना चाहिए यह हमारे ही शासननायक प्रभु महावीर स्वामीजी ने कहा है। यह प्रमाद ही जीव को पतित बनाता है। प्रमाद सिर्फ शरीर का नहीं बल्कि मन का। 
 
शरीर को अप्रमादी बनाने का कारण यही है की मन प्रमादी ना बने क्योकि व्यर्थ बैठे रहने से जीव को संसार के भोग ही याद आते है। काल का भी प्रभाव जारी रहता है इसीलिए उत्तम साधक अवस्था प्राप्त करने की उत्तम दिनचर्या शास्त्रो में बताई गई है। जब गुरुकुल होते थे तब सर के बाल ऊपर की ओर बाँध कर पढ़ाया जाता था ताकि गलती से भी नींद आये तो बाल खींचे जाने पर अभ्यासु जीव चौंक जाए और पढाई में मन लगाए। सोचिये, कितना मजबूत अनुशासन था। एक क्षण का भी प्रमाद ना मिले ऐसी व्यवस्था की जाती थी। धन्य है जिनशासन के तमाम पूज्य वीर गुरुदेवो को जिन्होंने यह अप्रमादी और परम उपकारी परंपरा को बरकरार रखा है। ऐसी अनुपम व्यवस्था और दिनचर्या होती है जिससे शिष्यो को ही प्रमादी बनने का अवसर प्राप्त नहीं होगा। 
 
यह अप्रमादी अवस्था ही जीवो को “बवाल” से दूर रखती है। इस व्यवस्था से जीव स्व में केंद्रित होता है और बाह्य प्रभावो से दूर रहता है। इस वजह से किसी के साथ जुड़ने का, टूटने का, कषाय का, दुःख का कोई भी प्रसंग नहीं बनता और उपशम भाव में आता हुआ जीव परंपरा में मोक्ष को प्राप्त करता है। 
 
यही है मोक्ष की परिभाषा। हमें भी बेकार बवाल से दूर रहना चाहिए। समझदार को इशारा काफी। मुमकिन हो उतना स्व में आ जाओ। यदि बवाल करना ही है तो श्री वीर के परम चाहक बन के कर्मो के साथ युद्ध मैदान में बवाल मचाओ। यह बवाल इतना भयंकर होगा की ज्ञान क्रिया रूप दो मजबूत पहियो पर चल रहे विरति के रथ में बैठकर जब हम शील का बख्तर पहनकर 12 प्रकार के तप के शस्त्रो के साथ मजबूती से मैदान में जाएंगे तब कर्म रूपी धूल हवा में उड़ेगी और मोहराजा रूपी शत्रु हार जाएगा। हमें बवाल करना है उस मोह राजा से, अपने आप से, कर्मो से, हमारी स्थिति से। यही बवाल आत्म कल्याण करेगा। 

 
हम सब अपने आत्म स्वभाव को जान के अंतरमन से जुड़े यही भावना। 
टीम वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल – बवाल पसंद आये तो दो नियम लीजिये। 
 
1. मुमकिन हो उतना स्व में ध्यान देंगे 
2. स्व में ध्यान देना फिलहाल मुश्किल हो तो पर में ध्यान देना तो छोड़ ही देवे। 
 
– टीम वीर गुरुदेव 
 
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