Adhyatm pipasa

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*अध्यात्म पिपासा*

वीर गुरुदेव टीम की ओर से आज का आर्टिकल है – अध्यात्म पिपासा

अनंत काल से जीव संसार के चक्र में घुमता ही जा रहा है। यहाँ तक की साक्षात तीर्थंकर परमात्मा की वाणी सुनी, उन्हें देखा, अनुभव किया लेकिन यह सब सिर्फ बाहरी क्रिया रह गई। अंतरमन को इस जीव ने कभी नहीं टटोला। अगर मन से धर्म को अपनाया होता तो यह जीव जन्म ज़रा मृत्यु से सदा के लिए दूर हो जाता लेकिन अभी भी हम संसार में घुम रहे है इसका अर्थ यही है कि संसार हमारे मन के अंदरूनी भावों में स्थायी है।

शिवसुख की चाहना रख के धर्म करे या न करे यह सब तर्क दूसरे पायदान पर आते है। प्रथम बात यही है कि धर्म करना किसलिए ? बिना लक्ष्य के कोई कार्य नहीं होते। जो जीव लक्ष्यविहीन कार्य करते जा रहे है वह समय की बरबादी करते है। जीव धर्म इसीलिए करते है ताकि उन्हें संसार से मुक्ति मिले। मोक्ष की इसी तलप को मन की प्यास कहते है और इसी मन की प्यास को कहते है पिपासा। पानी शरीर की प्यास बुझाता है तो सवाल है मन की प्यास कौन बुझायेगा ? जवाब है – अध्यात्म।

जिसको अध्यात्म की प्यास लग गई, समझ लो वह जीव मुक्ति की राह पर चलने लगा। यह ऐसी प्यास है जो बुझती नहीं बल्कि दिनबदिन बढ़ती है। लेकिन बढ़ने के साथ साथ यह प्यास जीव को संतृप्त करती रहती है। जैन शासन में अनेक वीर गुरुदेव हुए जिन्होंने अध्यात्म की परिभाषा को अपने शब्दों के माध्यम से आसान रूप से समझाया है। जब भी अध्यात्म शब्द आता है तो वीर गुरुदेव श्री आनंदघनजी महाराजा का नाम निश्चित रूप से याद किया जाता है – “आनंदघन चेतन है खेले देखे लोक तमाशा” ऐसे अनेक पद पूज्यश्री ने बनाये है। एक एक पंक्ति मन मस्ती से भरपूर है। यही मन मस्ती का नाम है अध्यात्म।

पूज्य गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा ने “अवधू आतम ज्ञान में रहना, किसी को कुछ नहीं कहना” पद द्वारा समझाया है की सिर्फ आत्मज्ञान में लीन बनो। स्व के बदले पर को केन्द्रस्थान पर रख कर की गई क्रिया व्यर्थ है। इसी स्थान पर हमारी मनोदशा विपरीत होती जा रही है। हमें अपने आत्मा की चिंता नहीं है लेकिन जगत क्या कर रहा है वह हम देखना चाहते है। पहले तो हमने सांसारिक अनर्थदंड अपनाये जैसे की दुनिया भर की खबरे जानना लेकिन धीरे धीरे हमने अपने अनर्थदंड रूपी व्यवहार को धर्म मार्ग में भी जोड़ दिया। दूसरे की ही क्रिया देख देख कर उसकी निंदा करते रहना हमारी आदत बन गई। शासन कहता है सिर्फ स्व की चिंता करो। पहले खुद इतने सक्षम बनो फिर आगे की सोचो।

अध्यात्म की दिशा में यही तमाम बातो को जानना आवश्यक है। अध्यात्म “यह सत्य, वह गलत” इन सब बातो से पर है। अध्यात्म की दिशा में जो जीव बढ़ता है वह बाह्य संयोगो से दूर होता हुआ आंतरिक दुनिया के विशाल कदमो का राजा बनता जाता है। तर्क, वितर्क जीव को मर्यादित करते है जबकि अध्यात्म की दुनिया जीव को निर्बंध दशा प्राप्त करवाती है, जहा उसे किसी के प्रति राग नहीं व् किसी के प्रति द्वेष नहीं रहता। बस मन के परिणामो को काबू में रख कर जीव चिर प्रसन्नता के मार्ग पर जाता है। मर्यादित मति वाले जीव ऐसे आध्यात्मि जीव को दूर से देखते रहते है, वे उन तक पहुँचने का प्रयत्न शायद कर भी ले लेकिन वह आध्यात्मि जीव अपने परिणाम को विशुद्ध करता हुआ इस प्रकार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है की उसे संसारी जीव से कोई लगाव नहीं रहता, वह तो बस अपनी मस्ती में मस्त रहता है। बाह्य रूप से भले ही वह संसार की व्यवस्था को निभा रहा हो लेकिन उसका आंतरिक सौन्दर्य इतना खिलखिला उठता है की उसे सभी जगह शिवगति ही नजर आती है। उसके मन की प्रसन्नता उसके चेहरे पर दिखाई देती है। उसका एक एक व्यवहार अध्यात्म का निखार प्राप्त करता है।

मोक्ष मार्ग के सोपान प्राप्त करने में गति समान तत्व है अध्यात्म। इस अध्यात्म की प्यास सिर्फ और सिर्फ सम्यग ज्ञान से ही आएगी। सम्यग ज्ञान की शुरुआत विनय धर्म से प्राप्त होगी। यह तमाम बाते एक दूसरे से जुडी हुई है। गीतार्थ गुरु भगवंत के सान्निध्य में ही इन बातो का सही रहस्य पता चलेगा। अतः हो सके उतना गुरु भगवंत के समीप रहना शुरू कर देवे।

वीर गुरुदेव टीम की ओर से आज का आर्टिकल है – अध्यात्म पिपासा – पसंद आये तो दो नियम लीजिये।

1. प्रतिदिन उठ कर दोनों हाथो को साथ में देखकर सिद्धशिला के ऊपर 24 तीर्थंकर परमात्मा बिराजमान है यह भाव से देखे।

2. श्री महावीर स्वामी को रोज तीन बार भाव से वंदन करे।

– टीम वीर गुरुदेव

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