Adhyatm ki garima

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*अध्यात्म की गरिमा*

 
वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल है – *अध्यात्म की गरिमा*
 
सदाकाल से जीव को अपना सम्मान सब से ज़्यादा प्यारा रहा है। आत्म सम्मान के लिए जीव किसी भी प्रकार का तनाव सहन नहीं कर पाता है। कभी कभी तो सम्मान को बचाने हेतु बड़े विवाद भी जीव अपना लेता है। किन्तु इतने भव भ्रमण करने के बावजूद इस स्थिति में कोई फर्क ही नहीं पड़ा और शायद इसी लिए मुक्ति से दूर है। 
 
ज्ञानीजन आत्म के जो सदगुण है, जो सच्चा स्वभाव है उसका सम्मान करने की सलाह देते है। पूज्य गुरुदेव श्री जयंतसेन सूरीश्वरजी महाराजा ने एक सुंदर रचना की है “निज आतम ने निज सत्ता थी ओलखी, निश्चय उपादान करण ते थाय जो” – हमें अपने अलावा सब की फ़िक्र है और वह भी व्यर्थ फ़िक्र। 
 
तमाम बातो को सिर्फ पर्याय की नजर से देखना ही ज्ञान अभ्यास की परिणति है। लेकिन हम उन पर्यायो में अपनापन समझकर खुद के ही सच्चे स्वरूप से दूर होते जा रहे है। छोटी छोटी बातो पर हम अपने आत्म सम्मान की गरिमा को ठेस पहुँची यह समझकर नाहक विवाद मोड़ लेते है। वास्तव में इन विवादों के चक्कर में आ कर हम हमारी आत्मा में जो विशाल अध्यात्म है उसकी गरिमा को ठेस पंहुचा रहे है। कभी कभी तो अत्यंत सामान्य बात पर हम बवाल मचा देते है। 
 
एक जगह सुंदर बात लिखी थी – “जिस पर हमारा अधिकार ही नहीं उस पर हमें हक़ नहीं जताना चाहिए” – इस बात का दिन रात चिंतन करना चाहिए। एक बहोत बड़े गुरु थे उनके अनेक शिष्य थे। कुछ शिष्य अविनीत थे और बार बार गुरु की आज्ञा से विरुद्ध जा रहे थे। करीबी लोगो ने गुरु से कहा की आपके शिष्य को समझाइए की आपकी बातो को माने। गुरु ने बड़े प्रेम से उत्तर दिया की, किसने कहा वह मेरे शिष्य है। मैंने कभी सोचा नहीं की वे मेरे है। में खुद मेरा नहीं हु, इस शरीर पर मेरा अधिकार ही नहीं तो किसी दूसरे के शरीर को मैं मेरा कैसे मानूँगा। वे लोग मेरे साथ रहे तो यह उनका कर्म था और उनकी नियति थी। आगे उनका जो होगा वो वही जानेंगे। मैंने सन्यास सिर्फ मेरी आत्म शुद्धि के लिए लिया है ना की शिष्यो की फ़ौज बनाने। 
 
वास्तव में हमें भी यही गहरा चिंतन करना जरुरी है। बात बात पर हम किसी की निंदा करने लगते है। “इसने यह किया – उसने वह किया” इन बातो के चक्कर में ही हमारा कुछ नहीं हुआ। श्री वीतराग परमात्मा का यही कथन है की “जीव तु खुद में समा” – जो खुद बंधन में बंधा हुआ है वह दूसरे को कैसे छुड़ाएगा। आत्म जागृति का परम सोपान यही है की जितना हो सके उतना बाहरी व्यवहार समेट कर अपने अंदरूनी हिस्से में झांखो, वहां देखो की कौन है जो भवोभव से आप से बात करने के लिए तड़प रहा है। आप उससे बात करो इसलिए वह अनंत काल से आपके साथ है लेकिन आप लगातार उसे Ignore कर के सिर्फ बाहरी दुनिया से जुड़े हुए हो। वह तत्व है – आत्मा। आपका शुद्ध स्वरुप, वो ही है जिसके साथ आपको रहना है। 
 
परमगति की ओर भी व्यक्ति तभी जा सकता है जब तमाम प्रकार के व्यवहार को छोड़कर सिर्फ स्वध्यान में केंद्रित होता है। श्री गौतम स्वामीजी का केवलज्ञान भी इसी वजह से रुक गया था क्योंकि उनमे प्रभु वीर के प्रति राग का विकल्प था। भले ही यह राग प्रशस्त हो किन्तु जब केवलज्ञान – मोक्ष प्राप्ति का समय होगा तब कर्मसत्ता इस राग का भी हिसाब मांगती है और अगले पायदान पर यानी की केवलज्ञान तक जाने के लिए रास्ता रोक देती है। इस कैवल्य नगरी में प्रवेश प्राप्त करना हो तो आपको नगरी के दरवाजे के बाहर तमाम प्रकार के व्यवहार, विकल्प, विक्षेप, विनिमय त्याग करने ही होंगे। यह नहीं किया तो अध्यात्म की गरिमा को ठेस पहुचाने का कार्य आप खुद कर रहे हो। 
विचारो की मलिनता ही अध्यात्म को नष्ट करती रहती है। यह अध्यात्म ही मोक्ष मार्ग में द्रुतगति दिलवाएगा। अध्यात्म यानी क्या ? सिर्फ सुने – पढ़े शब्द बोल देने से अध्यात्म नहीं मिलेगा। यह एक अनूठा एहसास है। जिसे यह प्राप्त हुआ उसे बाहरी दुनिया की हड़बड़ी परेशान नहीं कर सकती। यदि हमारे आसपास हो रही एक भी घटना या प्रसंग से हमारे मन में असर होती है, विचार उठते है तो समझ लीजिये हम सिर्फ बोलने के आध्यात्मि है किन्तु वास्तविकता कुछ और है। व्यवहार धर्म को निभाने हेतु हमें कुछ क्रिया शायद करनी पड़े लेकिन उसमे हमारा भीतर प्रस्तुत हो गया, उस कार्य करने में हमारी आंतरिक शक्ति काम पर लग गई, विचारो में परिवर्तन हो गया तो हमें चौकन्ने होने की जरूर है। हम गलत मार्ग पर जा रहे है। वीर गुरुदेवो का यही आदेश है की, हमने यथाशक्ति विरतिधर्म अपनाया हुआ हो लेकिन उसके बाद भी हम आगे बढ़ने के बदले पीछे आते रहे तो यह हमारी नाकामयाबी साबित होगी। अध्यात्म की गरिमा बनाये रखना आवश्यक है – सिर्फ वचन से नहीं, निभाने से भी। 
 
अंत में एक लाइन में सार – “विकास के नाम पर विनाश नहीं होना चाहिए” – समझदार को इशारा…………  

 
वीतराग की आज्ञा विरुद्ध कुछ भी लिखा गया हो तो त्रिविधे मिच्छामी दुक्कडम्
 
वीर गुरुदेव की ओर से आज का आर्टिकल है – *अध्यात्म की गरिमा* पसंद आये तो दो नियम लीजिये। 
 
1. कभी संयमी जीव की निंदा नहीं करेंगे 
2. घर के अलावा कहा क्या हो रहा है उसकी फ़िक्र नहीं करेंगे (अनुकंपा भावो के लिए मर्यादा नहीं)
 

 

 
Team veer gurudev
 
 
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