90 ka sapna – kalpana ya vastavikta

 
90 का सपना – कल्पना या वास्तविकता ?

टीम वीर गुरुदेव की तरफ से आज का आर्टिकल है – 90 का सपना – कल्पना या वास्तविकता ?

परमतारक परमात्मा त्रिभुवननाथ प्रभु श्री महावीर स्वामी की दिव्य यात्रा से हमें प्रतिपल सुनहरे आध्यात्मिक जीवन की प्रेरणा मिलती ही रहती है। इसी आध्यात्मिक आत्मीय आनंद को प्राप्त करने से इस भव के साथ परभव में भी शासन, समता और समाधि की प्राप्ति होती है। उत्तम दशा प्राप्त करने हेतु मानसिक समाधि की आवश्यकता रहती ही है और इसी समाधि को प्राप्त करने के सुनहरे मार्ग जिनशासन में बताये गए है। 
 
समाधिमृत्यु – ऐसी पराकाष्ठा जिसे पाना हर कोई चाहता है क्योकि मृत्यु की शुरुआत से मृत्यु के अंत तक का जो समय है वह जीव को विहवल कर देता है और मानसिक तबाही मचा देता है और इसी समय पर ज्ञान के आधार पर जीव समाधि को बरक़रार रख सकता है। 
 
फिर भी, जब यह समय प्रगट होता है तब क्या हाल होता है ??? इसी विषय की एक *काल्पनिक वास्तविकता* का प्रयास….  *90 का सपना*
 
किसी समय जब जीव नींद में था तब उसे स्वप्नलोक का कभी न देखा हुआ था और कभी न सोचा हुआ था वह दृश्य दिखा। ऐसा दृश्य जिसे देखकर उसके होश उड़ गए। वह उन घडी को देखने के लिए डरता नहीं था किन्तु स्वप्न देखने के बाद उसे अपने प्रमादी जीवन का एहसास हुआ। ऐसा क्या दृश्य था ? 
 
मृत्यु ? नहीं, सीधी मृत्यु देख ली होती तो भी शायद फर्क नहीं पड़ता क्योकि मृत्यु सहज ही है इसलिए वह जीव भी इस हकीकत से इतना ज़्यादा नहीं डरनेवाला था। 
 
सब से भयानक तथ्य तो मृत्यु ही है लेकिन स्वप्न में मृत्यु को भी ना देखकर ऐसा तो क्या देखा की वह जीव थोड़ा परेशान हो गया ? 
 
जवाब है 
 
*मृत्यु का जन्म* 
 
जी हाँ, ऐसी वास्तविकता जो अपेक्षा से मृत्यु से भी डरावनी है। जब मृत्यु करीब है यह ज्ञान होता है तब से बेचैनी बढ़ती ही जाती है। देवलोक में देवो को अपनी मृत्यु के 6 महीने पहले ज्ञान हो जाता है और वह आखरी 6 महीने वह देव अति पीड़ा और दुःख में बिताते है। अन्य देवो से मदद मांगते है परन्तु आयुष्य कभी किसीका नहीं हुआ। साक्षात् तीर्थंकर परमात्मा श्री वीर प्रभु ने भी इन्द्र की एक क्षण मात्र आयुष्य बढ़ाने की विनती के उत्तर में कह दिया था की, यह कभी हुआ नहीं और कभी होगा नहीं की कोई जीव अपना आयुष्य बढ़ा सके। 
 
यहाँ वह जीव भी ऐसा स्वप्न देखता है की उसकी उम्र *90* वर्ष की हो चुकी है और अब उसके पास अल्पकाल है जीने को। वह अभी भी स्वप्न में ही है परन्तु स्वप्नलोक भी ऐसा है की जीव को वास्तविक ही लगे। वह जीव सोचने लगा कि, “मैं कब इतना बड़ा हो गया ? पलक झपकते ही मेरा पूरा जीवन बीत गया मुझे तो पता भी ना चला। अभी तो मैं पानी में कागज़ की नाव चला रहा था ! अभी तो मैं स्कूल में शरारते करता था ! अभी तो मैं गुरुदेवो के व्याख्यान श्रवण कर रहा था ! अभी तो मैं शासन के कार्यो में जुड़ा था ! अभी तो मैंने पिताजी के साथ व्यापार बढ़ाया ! अभी तो विवाह हुआ ! अभी तो मैंने बड़ा घर लिया ! अभी तो बच्चो के जन्म हुआ और उनके विवाह हुए ! अभी ही तो मैंने निवृत्ति ली और घर में बैठ गया !!!
 
यह सब कब बीत गया कुछ पता नहीं चला। आजीवन बस घर, परिवार, व्यापार, रिश्ते नाते इन सब की व्यवस्था में ही रह गया लेकिन आत्मा के लिए कुछ भी नहीं किया। जब भी अवसर होता था, यही सोचा की फिलहाल व्यापार आदि के कार्य करने है, धर्म क्रिया तो बाद में कर लूंगा। लेकिन जीवनपर्यन्त इस *बाद* शब्द से आबाद नहीं हुआ। तो आखिर मैंने किया क्या ? 
 
“हे प्रभु ! मेरे पास इस जीवन में मात्र कुछ महीने बाकी है। और अब शरीर ऐसा है की मैं बैठ के माला गिनने के अलावा कुछ भी नहीं कर पाउँगा। यह कैसी विटंबना ?*
 
जीव मृत्यु से नहीं डरा लेकिन मृत्यु का जो जन्म हो चूका था अर्थात अब मृत्यु प्रतिक्षण दिखने लगा था उस स्थिति से निकलना जीव के लिए अति कठिन हो चूका था। उसे एहसास हुआ की, मैंने आजीवन बस दूसरो की बुराई आदि में बिता दिया, स्वात्मा की उन्नति के लिए सचोट मार्ग नहीं अपनाया। योग्यता होने के बावजूद अपने आपको अयोग्य ही बनाया। पर अब क्या ?
 
मृत्यु के जन्म की इस कठिन स्थिति से जीव इतना परेशान हो गया की तुरंत उसकी नींद खुल गई। स्वप्नलोक का दृश्य ख़त्म हो गया, उसे वास्तविकता तक आने में कुछ क्षण लग गए लेकिन जैसे ही उसने जाना की यह सब स्वप्न था तो वह पहले थोड़ा खुश हुआ किन्तु तुरंत विचार आया की “मैं स्वप्नलोक से बाहर तो अभी भी नहीं हूँ। यह संसार भी तो एक स्वप्नलोक है, कभी भी बिखर सकता है।”
 
विचारो का बवंडर इतना तेज हो चूका था की जीव के अंतरमन में बड़ा युद्ध शुरू हो गया। उसको यही महसूस हुआ की यह पूर्ण जीवन ऐसे ही व्यर्थ जा रहा है। 
 
अब तक उसने कल्पना में वास्तविकता को देखा अब वही जीव वास्तविकता में कल्पना कर रहा था। वह कल्पना कुछ ऐसी थी,
 
उसने सोचा की, मैं 90 वर्ष का हूँ तब तक की स्थिति मैंने देखी परन्तु आगे क्या ? आगे जैसे जैसे मृत्यु करीब आ रही है वैसे मैं अपने ही अंदर घुट घुट के जीऊंगा। *मौत आये तब कैसा रहूं, कितना मजबूत बनूँ* यह सब तैयारियां करूँगा, मेरे नाम पर जीवित महोत्सव कर लूंगा, परिवार में सबको उनका हिस्सा दे दूंगा। यह सब करने के बाद एक दिन आ जायेगा जब इस कुछ महीने के मृत्यु महोत्सव का अंतिम चरण शुरू होगा। मेरी सांस फूलने लगेगी, शरीर में बड़ा दर्द होगा, आसपास हो रही घटनाओ का भान नहीं रहेगा, मेरी आँखे स्वयं बंद होती रहेगी किन्तु मैं कुछ पल और जीने की चाह में अपना पूर्ण सत्व आँखे खुली करने में लगा दूंगा। मैं चिल्लाऊंगा की मुझे नहीं मरना है, मुझे जीना है। मैंने कुछ धर्म नहीं किया, कुछ आराधना नहीं की तो अब करनी है। में मृत्युदेवता से विनंती करूँगा की मुझे कुछ दिन और दे दो ताकि मैं अच्छी आराधना कर लूँ, हो सके तो दीक्षा ही ले लूँ। तब मृत्युदेवता भी कहेंगे की *धर्म करने के लिए तुझे 90 वर्ष दिए तब तू कुछ नहीं कर पाया, अब 9 मिनट में क्या करेगा ?*
 
मृत्युदेवता के साथ ऐसी ही नोकझोक चल रही थी और ध्यान हट गया था तभी अचानक क्या हुआ, पता ही ना चला, आँखे बंद हो गई, शरीर सून हो गया, सांस छूट गई अभी भी कोशिश कर रहा हूँ की आँख खुल जाए, धड़कने चलती रहे पर नाकामियाब हो रहा हूँ। इधर डॉक्टर और परिवार वाले बोल रहे है की इनकी मृत्यु हो चुकी है। मुझे चिल्लाना है जोरों से की मैं अभी जीवित हूँ. अभी कुछ जान बाकी है मुझमे। पर कौन जाने क्या हुआ ? मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा हूँ। 
 
पास में आ कर किसीने कान में कहा की, तुमने तुम्हारे पिताजी आदि कई परिवारजनों की मृत्यु देखी, अब तुम्हारी बारी है। यह वास्तविकता है। लेकिन उस आवाज को मैंने अनसुना कर दिया। मैंने खूब जोर लगाया और हाँ, मैं कामियाब हुआ। मैंने अपने आपको जीवित कर लिया। मैंने अपना आयुष्य बढ़ा दिया। मैं चिल्लाया की मैं ज़िंदा हूँ, लेकिन शायद मेरे परिवार ने सुना नहीं क्योकि वे बाहर चले गए थे। मैं तुरंत उठा और बाहर गया, वहाँ सब लोग दुखी थे, कोई रो रहा था। लेकिन मैंने भी कह दिया की मैं अब जीवित हूँ। मेरी आवाज काफी धीमी थी इसलिए कोई सुन नहीं पाया। 
 
फिर मैं उनके पास गया, उनको बुलाना चाहा पर पता नहीं क्या हो गया सब मुझे अनदेखा करने लगे। क्या अब किसीको मेरी फ़िक्र नहीं ? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। जरूर मेरे लिए कुछ व्यवस्था करने में जुटे हुए है। तभी अचानक बहुत सारे लोग मेरे घर आ गए। मैं सोचने लगा पता नहीं क्या कर रहे है। मैंने तुरंत सोचा की, जिसको जो करना है करने दो, मैं मौत के मुख से बाहर आया हूँ तो अब मुझे बस धर्मक्रिया ही करनी है। तुरंत मंदिर गया दर्शन करने। वापिस आते हुए देखा की घर के बाहर भारी भीड़ है और किसी को एम्बुलेन्स में कही ले जाया जा रहा है। तुरंत वहां गया तो पता चला यह तो शबवाहिनी है। मैंने कई लोगो को पूछा की क्या हुआ है ? सब इतने दुःख में थे की कुछ बोल नहीं पाए। अपने परिवार का दुःख दूर करने में मुश्किल से शबवाहिनी के पास पहुंचा तो देखा किसी के शरीर को स्मशान ले जा रहे है। मैंने ठीक से देखा तो जो हकीकत देखी उसको जानकर पैरो तले जमीन ही नहीं रही। 
 
*मैंने अपने आपको ही देखा* 
 
मेरे दिमाग में विचारो का भूकंप चल उठा। आखिर क्या हो रहा है मेरे साथ ?
 
एहसास हुआ, लोगो में से कोई मुझे देख नहीं रहा था। मुझे कान में बोले गए शब्द याद आ गए। *अब तुम्हारी बारी है* 
 
*मैंने जान लिया की मैं इस दुनिया में नहीं रहा।*
 
और परिवार का प्रेम भी देखा, जिसके लिए मैंने 70 वर्ष तक मेहनत की और अपने आत्मा के लिए कुछ नहीं किया वही लोग मुझे 7 घंटे भी नहीं रखेंगे, जला देंगे। इसमें उनका भी क्या दोष है, यही संसार का नियम है। मुझे ऐसा संसार देखकर वैराग्य हुआ पर अब क्या ? अब तो दीक्षा भी कैसे लूँ ? क्योकि शरीर ही नहीं रहा। 
 
लोग जाते है परिवारजनों की अंतिमयात्रा और विधि देखने। मैंने सोचा चलो, खुद की अंतिमविधि भी देख ले। और यह तो मेरा शरीर ही था, इसके द्वारा मैंने अनेक कार्य किये तो *मेरी अंतिमविधि में तो जाना ही पड़ेगा ना* 
 
मैं भी परिवार के साथ शबवाहिनी में बैठ गया, पुरे रास्ते में सब रो तो रहे थे, इसका अर्थ हुआ की उनको मुझ पर प्रेम तो था ही। रस्ते में मैंने वह तमाम दृश्य देखे जिनके साथ मैंने जीवन बिताया था। किन्तु अभी भी विचारो का भूकंप शांत नहीं होता था। स्मशान पहुँचे और बस, जिस शरीर के उपयोग से मैंने अपना सांसारिक साम्राज्य बनाया था उसी शरीर को जलाया गया। *क्या पाया मैंने* – जो मुख्य था, अब वही राख बन गया। 
 
मेरा शरीर भी ऐसा हो गया की मेरे ही लोग सब को वापिस घर भेजने लगे है। सब गए, मैं रह गया। देखा, आखिर तो यही आ गया तो क्या कर लिया ? कौन बचा सका मुझे ? क्या कोई ऐसी क्रिया नहीं जिससे मृत्यु से बच सके ? कितनी कोशिश की थी जीवित रहने की लेकिन कुछ ना मिला। 
 
अब आगे क्या ?
 
यह तो मुझे कुछ समय दिया था मृत्युदेवता ने अपने आपको देखने को। वह देवता अब आ गया मुझे लेने। कहाँ ले जाएगा ? यह तो फिर से चिंता का विषय हो गया। क्यों ?
 
क्योकि मैंने आजीवन ऐसे कोई कृत्य नहीं किये जिससे मुझे सदगति मिले। मेरे कृत्य पापी और हिन ही रहे तो फिर दुर्गति में जाना तय है। जिसका वर्णन सुनने पर श्रेणिक राजा बार बार प्रभु वीर से कोई उपाय मांग रहे थे, अब वह स्थान मुझे भी प्राप्त होने जा रहा है। *मुझे नहीं जाना* – पर कर्म किसीकी नहीं सुनता। मुझे जाना पड़ेगा। क्या करूँ ? कैसे बचूं ? बचने का कोई उपाय है भी ???
 
 
बस, यहाँ तक उस जीव की वास्तविकता की कल्पना जारी रही। आखरी सवाल – कोई उपाय है भी क्या ?
इसका जवाब हम जानेंगे अगले रविवार – दिनांक 17 सितम्बर को शाम 7 बजे। 
 
— 

 
Team veer gurudev
 
 
Download pathshala app from play store –  veergurudev pathshala
Click here – 
About the Author

Leave a Reply

*

captcha *