धन धन मुनिवरा – 1

guru maharaj
गुरूवार गुरु का वार

धन धन मुनिवरा

करीब १५० साल पहले की घटना

ज्ञान साधना, चुस्त चारित्र पालन मे लीन होते हुए भी हमेशा तपस्या में भी आगे – दुबली पतली सी काया
मुनिवर ने बहोत सी अट्ठाई की और पारणे में चुस्त अभिग्रह धारण करते। एक बार अट्ठाई के पारणे में अभिग्रह धारण किया की रखिया (राख) से पारणा करेंगे। मुनिवर गोचरी वहोरने गए, उनके चारित्र के डंके पुरे भारत में गूंजते थे इतने प्रख्यात थे। इस लिए सब लोगो ने उन्हें अपने घर पधारने की विनंती की – पारणे का लाभ लेने सब तैयार। मुनिवर जहा गए वहा बहोत सी चीजे लोग धर देते। लेकिन वे वापिस चले जाते। एक घर में गए जहा एक वृद्ध औरत ने बारी बारी सब चीजे बोली लेकिन गुरुदेव ने सब में शांत चित्त से ना कहा आखिर वृद्ध औरत ने गुस्से में आ के कहा “बावसी, आप सब में ना बोल रहे हो, तो आप के काई राखोड़ो खपे” – और मुनिवर ने बोला धर्मलाभ। मुनिवर ने अट्ठाई तप का पारणा सिर्फ राख से किया।

घटना हे क्रियोद्धार भूमि जावरा की और उन तपस्वी महात्मा का नाम विश्व पूज्य प्रातः स्मरणीय दादा गुरुदेव श्रीमद् विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा – जिन्होंने जावरा में ही जिनशासन का तीसरा और आखरी क्रियोद्धार किया। जिनके चारित्र की महक आज भी गूंजती हे। जिन्होंने जिनशासन में चारित्र जीवन के लिए एक नया प्राण फूंका – जिनका समग्र जीवन नव दीक्षितो के लिए एक महा आदर्श बन चूका हे – जिन्होंने अभिधान राजेन्द्र कोष जैसा महाग्रंथ जैन शासन को दिया हे।

धन धन राजेन्द्रसूरीश्वरा

काँटा के पथरा थी पगमाँ लोहि नी धारा वहेता, मुक्तिवधु ना कंकु पगला मानी बहु हरखाता
धन धन मुनिवरा………….

टीम वीर गुरुदेव
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