अनंत जीव संहार का कार्य – रात्रिभोजन

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वीर गुरुदेव फेडरेशन की और से आज की बात हे जैन धर्म के मूलभूत सिद्धांत रात्रिभोजन त्याग की –
जिनशासन में रात्रिभोजन महा पाप कहा गया हे। सामान्यतः कुछ लोगो को सवाल रहता हे की रात्रिभोजन पाप क्यों ? इसके कुछ माप बताये गए हे,धार्मिक व् वैज्ञानिक कारण भी बताये गए हे, तो आइए जानते हे कुछ बाते –

सबसे पहले तो जिनशासन की कोई भी बात हो वो तीर्थंकर परमात्मा, सर्वज्ञ कथित बात होने से बिना किसी शंका किये उसको मान लेना जरुरी हे – क्युकी सर्वज्ञ का कथन कभी मिथ्या नहीं होता, परमात्मा की कही हुई हर बात का बहोत गहरा तात्पर्य होता हे, बहोत सी बाते जुडी होती हे। इस लिए सवाल का समाधान करना चाहिए लेकिन “क्या ऐसा हो शकता हे” ऐसी शंका करना उचित नहीं हे।

दूसरी बात रात को तमस्काय (अँधेरे) के जीव उत्पन्न होते हे – तो रात को खाने से उन जीवो का भी भक्षण होता हे। किसी को लगेगा की हम तो उजाले में खाते हे – तो रात को हम १ करोड़ सूरज जितनी रोशनी में भी खाए तब भी वे जीव उत्पन्न होंगे ही क्युकी वे जीव सूरज की रौशनी में ही जीवित नहीं रह शकते उसके अलावा अँधेरे में उन जीवो की उत्पत्ति होती हे।

तीसरी बात – अरुणवर नामक समुद्र की लहरे इतनी ऊँची उछलती हे की वह अपकाय के जीव (पानी के जीव) भरतक्षेत्र तक गिरते हे, दिन में तो धरती तक आते आते सूरज की गरमी में वे जीव मर जाते हे परन्तु रात में सूरज न होने से उन्हें धरती तक आने की वजह मिल जाती हे और अगर हम रात्रिभोजन करते हे तो साथ में उनका भी भक्षण हो जाता हे। यह सब जीव इतने सूक्ष्म होते हे की सिर्फ केवली भगवंत इन्हे देख शकते हे – दुनिया का कोई टेलिस्कोप इन्हे नहीं देख शकता। इसी लिए पूज्य साधु साध्वीजी भगवंत को भी रात्रि में विहार करना निषेध किया गया हे, और सुबह भी विहार करते हे तो कामली का उपयोग करने का बोला गया हे।
चौथी बात – जैन धर्म में कोई भी बात सिर्फ कहने के लिए नहीं दी गई हे, सभी बातो के पीछे गूढ़ रहस्य हे और वैज्ञानिक कारण भी जुड़े हे। यह नियम हे की सोने से तीन घंटे पहले भोजन पूर्ण हो जाना चाहिए, ताकि सोने के समय तक भोजन का पाचन अच्छी तरह से हो जाये, अगर ऐसा नहीं किया गया तो और खाने के बाद ३ घंटे पहले सो गए तो पाचन ठीक से नहीं होता और खाना वापिस आता हे मतलब की खाने के बाद पाचन की जो प्रक्रिया हे उसमे अवरोध होता हे और परिणाम कोलेस्ट्रॉल की बीमारी होता हे। जब सोते हे तब हमेशा बायीं और मूड के सोना चाहिए ताकि पाचन की प्रक्रिया संपूर्णतय अच्छी हो लेकिन रात को खाने से पेट भरा हुआ रहता हे जिससे सोते समय इंसान करवट पे नहीं सो पाता, सीधा ही सो जाता हे और यही से कोलेस्ट्रॉल की शुरुआत होती हे, जो आगे चल के गैस, एसिडिटी, ब्लड प्रेशर, हार्ट बीमारी आदि जानलेवा बीमारी तक भी जा शकता हे। कोई सोचेगा की हम रात ८ बजे खा के ११ बजे सोते हे तो ३ घंटे हो गए – इसमें भी पहले तो जिनाज्ञा भंग तो हुआ ही – रात्रिभोजन का पाप तो लग ही गया और देर रात को सोने से भी शरीर को हानी हो शक्ती हे। इंसान को हमेशा ब्रह्म मुहूर्त में उठना चाहिए यानी की सुबह 4 बजे से 5.30 तक उठ जाना चाहिए क्युकी उस समय की आबोहवा जिसे ऑक्सीजन कहते हे वो एकदम स्वच्छ और निर्मल रहती हे जो शरीर के लिए काफी ज़्यादा सुखकारक हे, और फिर उस समय किया गया जाप, योग, कसरत आदि क्रिया भी आत्मा व् शरीर के लिए बहोत लाभ दायक हे। आज विदेशो में लोगो ने यह करना शुरू कर दिया हे पर अफ़सोस जहा योग का जन्म हुआ उस भारत देश में लोग इसे भूल रहे हे। तो, मूल बात में अगर हम रात को देर से सोयेंगे तो सुबह के पवित्र वातावरण से दूर रहेंगे। तो शरीर के सुस्वास्थ्य के लिए ही रात्रिभोजन छोड़ना उचित हे।

अब रात्रिभोजन से आखिर पाप कितना लगता हे वो जानते हे –
एक बात लगभग सब लोग बोलते हे की रात को खाना मांस खाने के बराबर हे और रात को पानी पीना खून पीने बराबर हे – लेकिन यह बात जैन शास्त्र में नहीं बताई गई हे, यह बात हिन्दू पुराण में लिखी गई हे, अब हिन्दू धर्म भी रात को खाने से निषेध करता हे और रात्रिभोजन के लिए मांस – खून की उपमा देता हे तो सोचिये जिसका तो सिद्धांत ही रात्रिभोजन त्याग का हे वह जैन धर्म क्या कहता होगा – कुछ माप दिया गया हे जैन धर्म में रात्रिभोजन के पाप का, वो देखते हे –

96 भव तक कोई मछुआरा मछली को सतत मारता रहे उससे जितना पाप लगता हे उतना पाप 1 सरोवर को सुखाने से (पानी खाली कर देने से) लगता हे,
108 भव तक सरोवर सूखाने से जितना पाप लगता हे उतना पाप 1 वन में आग लगाने से मिलता हे,
101 भव तक वन में आग लगाने से जितना पाप लगता हे उतना पाप 1 बार कुवाणिज्य (अनीति वाला व्यापार) करने से लगता हे,
144 भव तक अनीति का व्यापार करने से जितना पाप लगता हे उतना पाप किसी पे गलत कलंक लगाने से मिलता हे,
151 भव तक किसी पे कलंक लगाने से जितना पाप लगता हे उतना पाप 1 बार के परस्त्री गमन से लगता हे,
और 199 भव तक परस्त्री गमन से जितना पाप लगता हे उससे भी ज़्यादा पापसिर्फ एक बार के रात्रि भोजन से मिलता हे।
फिर से पढ़िए और सोचिए क्या कर रहे हे हम, क्या ऐसे घिनोने पाप हमें मंजूर हे ? क्या इतना जान के भी हम रात्रि भोजन करेंगे ? नहीं। याद रखिए, रात्रि भोजन सिर्फ इस लिए न छोड़े की आप को पाप नहीं लगेगा, पुण्य मिलेगा, अच्छे कर्म बंधेंगे वगेरा … वगेरा … नहीं – रात्रिभोजन २ वजह से छोड़िये १. मेरे परमात्मा की आज्ञा हे, मुझे उन पे संपूर्ण श्रद्धा हे – उनके वचन सर मान्य होंगे। २. हमें कोई हक़ नहीं हे किसी भी जीव की हिंसा करने का, जीव की हिंसा न हो इस लिए छोडो रात्रि भोजन. उसके बाद पाप पुण्य की सोचो। ज्ञानी कहते हे की जन्म से मृत्यु तक रात्रि भोजन का एक निवाला मुह में नहीं जाना चाहिए अगर कर्म वश कभी रात को कुछ खाए तो एक एक निवाला उसे १ साल की भयंकर गर्मी में शेके गए पत्थर को खाने जैसा लगता हे – वो रो रो के खाता हे, इतना ही नहीं दूसरे दिन वो गुरु भगवंत के पास एकदम ऊँचा प्रायश्चित भी लेता हे।

क्या अब आप रात्रिभोजन करोगे ? इस सवाल के भी कुछ जवाब हे – जिसे पढ़ के हमें लगेगा की हमारा स्थान शासन में कहा हे – जानिए,
लोगो के अजीब से जवाब आते हे जब गुरु भगवंत उन्हें रात्रिभोजन छोड़ने की बात करते हे जैसे की –
१. दुकान से देर हो जाती हे
२. मेरे से चौविहार नहीं होते पर में रात को एक बार खाने के बाद नहीं खाता
३. में रोज चौविहार करता हु पर रवीवार को परिवार के साथ बहार जाता हु इस लिए रवीवार की छूट रखता हु।
४. मेरे घर पे तो चौविहार करता हु पर कभी शहर से बहार जाता हु तो छूट रखता हु।
५. भूख सहन नहीं होती, तो खाना पड़ता हे
६. में सिर्फ लोगो की मदद करना धर्म मानता हु – बाकि सब क्रिया से कोई फरक नहीं पड़ता।
७. अभी आराम से धंधा कर लू फिर ४० साल के बाद ये सब धर्म करूँगा।
और भी बहोत से अजीब जवाब सुनने को मिलते हे।

अब हमें यह सोचना हे की – महामूला जिनशासन हमें सस्ते में मिला हे इसी लिए हमें इसकी कदर नहीं हे ना ? आर्य देश की संस्कृति रही हे की लोग अपने संस्कार, अपने सिद्धांत, अपने धर्म के लिए जान तक दे देते हे और हम क्या ४ घंटे के लिए रात्रि भोजन नहीं छोड़ शकते ? क्या यही हे हमारी धर्म के प्रति खुमारी ? कहने में संकोच नहीं हे की हम से ज़्यादा अजैन लोग जैन धर्म के प्रति श्रद्धा रखते हे – गुजरात में अहमदाबाद से बनासकांठा की और जाये तो रास्ते में कई ऐसे गाँव मिलेंगे जहा जैन धर्म का बहोत प्रभाव हे लेकिन गाँव में एक भी जैन नहीं हे – गुरु भगवंत विहार में होते हे तो रबारी लोग उनकी जबरदस्त सेवा करते हे, मेहसाणा के पास में पटेल लोग ने आजीवन चौविहार के नियम लिए हे, कोई एक गांव हे जो की पूरा मुस्लिम गांव हे – किसी पूज्य आचार्य भगवंत की वाणी से प्रेरित हो के गांव के सभी लोगो ने टी वी तोड़ दिए, मध्य प्रदेश के मालव भूमि बहोत से हिस्सों में राष्ट्रसंत श्री जयंतसेनसूरीश्वरजी का इतना प्रभाव हे की वहा के आदिवासी, मुस्लिम आदि अजैन लोग पूज्य गुरुदेव को भगवान मानते हे और अपना जीवन जैनी बना दिया हे, मालव भूमि में लगभग सभी की दुकान में महावीर स्वामी और श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी की फोटो देखने मिल जाएगी। मुनीराज श्री वैभवरत्न विजयजी की प्रेरणा से भीनमाल, अहमदाबाद, सूरत, मुंबई आदि कई जगह अजैन लोगो ने अपना जीवन बदला हे इतना ही नहीं भारत के बहार मोरक्को, अमेरिका, फिलिपाइन्स आदि देश के जन्म से ही विदेशी लोगो ने नॉन वेज छोड़ा हे। राष्ट्रसंत श्री तरुणसागरजी म सा की प्रेरणा से काफी जैन अजैन लोगो ने अपना जीवन बदला हे। इतना ही नहीं जर्मनी देश को कई बार जैन जर्मनी बुलाया गया हे क्युकी वहा के लोग मानते हे रात को खाना पाप हे। और ये सच हे पुरे विश्व में जैन धर्म का प्रभाव जर्मनी पर काफी रहा हे और इसी लिए जैन धर्म पे सब से ज़्यादा रिसर्च जर्मनी देश में हो रही हे। और इसी के चलते वहा के लोग रात को खाना छोड़ने लगे हे।

अब बताओ कौन सही सम्मान कर रहा हे जैन शासन का – हम या वो ? हमें मुफ्त में मिला हे इस लिए हमें कीमत नहीं हे, उनको नहीं मिला हे पर फिर भी हमारी क्रिया, सिद्धांत देख के सम्मान करते हे। याद रखिये नियम में शायद थोड़ी छूट हो शक्ती हे पर सिद्धांत में नहीं – रात्रिभोजन त्याग सिद्धांत हे – इसमें ५ तिथि करेंगे, महीने की ५ दिन की छूट, रवीवार की छूट, खाने के बाद नहीं खाएंगे ये सब नियम आये ही कैसे ? ये सिद्धांत हे मतलब करना ही हे। पूजा आदि तमाम क्रिया धर्म से भी रात्रिभोजन त्याग ज़्यादा जरुरी हे। पूजा करना धर्म हे पर रात्रिभोजन करना अधर्म हे – धर्म करने से ज़्यादा अधर्म छोड़ना जरुरी हे फिर धर्म अपने आप होगा। एक तरफ हम वर्षीतप, मासक्षमण, पालिताना – गिरनार की छठ कर के सात जात्रा आदि करते हे और खुश रहते हे की चलो ये कर लिया अब मेरा मोक्ष पक्का – जी नहीं, ये सब गलतफैमी हे – इतना महान तप करने के बाद अगर हम रात्रिभोजन में जाते हे तो तप का जो पुण्य था उससे ज़्यादा रात्रिभोजन का पाप बढ़ जायेगा, फिर सारा धर्म निरर्थक होगा।

अब ज़रा ध्यान से पढियेगा :-

यह बात लिख रहे हे तब किसी ने अच्छा सवाल किया की हम से संपूर्ण चौविहार नहीं होते तभी गुरुदेव नियम देते हे की एक बार खाने के बाद मत खाना रात को या ५ तिथि चौविहार कर लो – तो गुरुदेव को बोलो ऐसे छूट न दे। तो इसका भी उत्तर देते हे- गुरुदेव निर्ग्रन्थ होते हे वे कदापि नहीं चाहेंगे की हम रात को खाए – लेकिन इतना सा नियम पालन करने में भी हमारा भला ही होगा – सोच में क्या फर्क हे वो जानिए अब, गुरुदेव यह सोचते हे की यह जीव थोड़ा सा मर्यादा में आएगा तो जीवन में और नियम में रहेगा उतना पाप कम होगा और जीव की मन स्थिति देखते हुए वे सिर्फ अपवाद मार्ग बताते हे की इतना नियम में रहो लेकिन हमारी सब से बड़ी गलती यह हे हम उस अपवाद मार्ग को मूल मार्ग बना देते हे और फिर ढंढेरा लगाते हे की मुझे तो गुरुदेव ने नियम दिया हे। अपवाद मार्ग कुछ समय के लिए ही होता हे उसमे आगे बढ़ के मूल मार्ग पे ही आना चाहिए। कोई यह भी बोलता हे की में ५ तिथि चौविहार करता हु – उनसे पूछना चाहेंगे कौन से दिन तिथि नहीं हे ? और क्या ऐसा हे की ५ तिथि रात को खाएंगे तो पाप लगेगा बाकि के दिन रात को खाने से पाप नहीं लगता ? और ५ तिथि भी हमने हमारी सहूलियत की बना रखी हे – वास्तव में हर तीसरा दिन तिथि का होता हे यानि की जो ५ तिथि कहते हे वो १५ दिन में ५ होती हे ना की १ महीने की। हमने तो दो ८, दो १४, एक ५ ये पांच तिथि बना दी पर सही मार्ग पे २, ५, ८, ११, १४ यह पांच तिथि होती हे। अब रात को १४ को खाओ या १३ को पाप तो एक सरीखा ही लगेगा – १४ को खाने का ना इस लिए कहा गया हे की ऐसी बड़ी तिथि में आयुष्य कर्म बंध होने का संभव ज़्यादा हे तो हमारा आयुष्य अच्छी गति में हो इस लिए १४ आदि तिथि में धर्म मय रहने को बोला गया हे। तो जरा सोचिये १४ को सिर्फ चौविहार करने से धर्म मय समय कैसे पसार हुआ ? ऊपर से वो तो खाने में समय गया तो धर्म बंध होगा या कर्म बंध ? उसमे भी आम के रसिक १४ को भी आम नहीं छोड़ेंगे, पूरा दिन पाप मय और सिर्फ चौविहार करने से अच्छा आयुष्य बंधेगा ? ये कहा का गणित हुआ – और १४ को चौविहार किया फिर दूसरे दिन रात को खाएंगे तो १४ के चौविहार का पुण्य नष्ट समझो। एक और बात ये पक्का नहीं हे की ५ तिथि में ही आयुष्य बंधेगा, ५ तिथि का संभव ज़्यादा हे ये कहा गया हे – यानि की आपने तिथि का चौविहार कर लिया पर दूसरे दिन रात को खाते समय आयुष्य बंध गया तो क्या करोगे ? क्या आप को लग रहा हे की चंद नियमो का सहारा ले कर हम अपने आप से ही धोखा कर रहे हे ?

जो ये सोचते हे की दुकान से देर होती हे, भूख लगती हे, अभी धर्म करने की उम्र नहीं हे – उनसे कहना चाहते हे की जिसे चौविहार करना हे ना वो आसमान जमीन एक कर के भी चौविहार तो करेगा – हमारे मन में एक ग्रंथि हो गई हे की चौविहार मतलब खाना खा लेना – जी नहीं धर्म त्याग का मार्ग बतलाता हे हमेशा, चौविहार का मतलब खाना खा लेना नहीं परन्तु रात्रिभोजन का त्याग करना हे – खाना तो हर कोई खायेगा लेकिन जैन धर्म में रात्रिभोजन त्याग बोला गया हे और वो भी विधिवत पच्चक्खाण ले कर जिससे संपूर्ण ताला लग जाता हे रात को खाने का। दुकान से देरी हो तो क्या पानी पी के चौविहार कर शकते हे, भूख लगे तो क्या थोड़ा सहन कर शकते हे – और ये बिलकुल मुमकिन हे। हमने बस मुश्किल बना दिया हे चौविहार को – अरे आत्मा में इतनी ताकत हे की वो १४ राजलोक को अलोक में फेर शकता हे तो क्या ४ घंटे की भूख सहन न हो ? और ऐसा हे तो पर्युषण के दिनों में कैसे हो जाते हे चौविहार ?? इसका मतलब यही हुआ की हम में ताकत हे परन्तु भाव नहीं हे, रात्रिभोजन को हिंसा समझते नहीं हे, परमात्मा के वचन पे श्रद्धा नहीं हे – फिर कितनी भी स्नात्र पूजा कर लो या पालिताना हो आओ – जीवन में परिवर्तन नहीं हे तो यह धर्म सिर्फ दैवी सुख देगा – आत्म सुख नहीं, कुछ लोग यह भी सोचते हे में मेरे गाँव या शहर में हु तब तक पक्का चौविहार करूँगा लेकिन कही बहार जाना पड़े तो छूट – ये छूट शब्द ही हमारी सारी कमजोरी की जड़ हे। अरे जो चौविहार करना चाहता हे वो करेगा ही और अनुकूलता में तो हर कोई धर्म कर लेगा जरा प्रतिकूलता में करो तब धर्म की श्रद्धा जाने, हकीकत में हमें धर्म पे श्रद्धा नहीं हे तभी ऐसा हो रहा हे। कोई मुनी भगवंत ऐसे ही कह दे की चौविहार करो तब हम नहीं करेंगे लेकिन अगर वे कोई चमत्कार दिखाए तब हम उन्हें भगवान मानेंगे और फिर चौविहार करेंगे, क्या यही हे हमारी मानसिकता ?

धर्म क्षेत्र हे इस लिए हम हज़ार विचार करेंगे की कैसे धर्म क्रिया से बचे पर जरा सोचिये क्या परमात्मा या मुनी भगवंत उनके फायदे के लिए हमें धर्म करना कहते हे ? नहीं, वे यही सोचते हे की यह जीव कुछ धर्म कर के अपना कल्याण करे। और फिर जैन हे हम, सत्व के भंडार हे – कच्चे विचार क्यों करे ? भूख लगे लगने दो – एक बार कोशिष तो करो – सफलता नहीं मिलेगी तो दूसरी बार कोशिष करो – “try and try and you will be succeed” – इंसान ही पहाड़ को तोड़ के सुरंग बना देता हे तो ४ घंटे की भूख सहन नहीं करेगा क्या ? एक बार आदत हो गई फिर कुछ तकलीफ नहीं होगी ? और ये सोचिए अगर कोई डॉक्टर हमें कह दे की आपको बीमारी हे आप कुछ भी हो जाये पर रात को मत खाना तो हम क्या करेंगे ? छोड़ देंगे ना – तो बड़ा कौन डॉक्टर या तीन भुवन के नाथ तारक तीर्थंकर परमात्मा ? अगर इन्सान कुछ ठान ले तो आधी सफलता मिल गई समझो, ऐसे ही एक बार मजबूत निर्णय लो चौविहार का बिना किसी छूट छाट के – अगर नहीं होता तो थोड़ा थोड़ा कर के आगे बढ़ो और एक दिन आप गर्व से कहोगे की “में जैन हु, में रात्रिभोजन का त्याग करता हु” – कोई सोचता हे की इन सब से ज़्यादा में गरीबो की सेवा करने को धर्म मानता हु – अब इस बात का कोई कनेक्शन कैसे हुआ ? गरीबो की सेवा करना काफी अच्छी बात हे पर जीवदया भी जरुरी हे क्युकी यह परमात्मा के वचन हे और वो इन्सान अगर चौविहार न करे पर डिनर का त्याग कर के उन पैसे से गरीबो की सेवा करे तभी वो सच्ची भक्ति कहलाएगी। वो नहीं होगा उससे – तो रात्रिभोजन त्याग कर के भी गरीबो की सेवा तो होगी ही – इसमें तो कोई पाबन्दी नहीं हे। हम अपने रोजगार आदि दैनिक क्रिया में जितना चुस्त रहते हे उसके १०% भी धर्म में रहे तो भी हमारा कल्याण हो शकता हे लेकिन हकीकत यह हे की हमने हमारी क्षमता एक दायरे में बाँध रखी हे – पहले से सोच लेते हे की मुज से नहीं होगा। जिसका आत्म विश्वास नहीं हे वो आगे कैसे बढ़ेगा हमें बस परमात्मा के वचनो पर श्रद्धा रखनी हे और बढ़ते रहना हे – न रुकना हे न दौड़ना हे बस आराम से चलते रहना हे।

कभी हम सोचते हे की अभी यह सब नहीं करना हे, अभी कुछ पैसे कमा ले बाद में पिछली उम्र में धर्म करेंगे – यह भी अपने आपको धोखा देने की ही बात हो गई। एक सीधी सादी बात हे हमारा आयुष्य कब खत्म होगा हमें नहीं पता, अगर छोटी उम्र में भी आयुष्य समाप्त हो गया तो कैसे करेंगे धर्म ? और कुछ धर्म किया नहीं होगा तो दुर्गति निश्चित ही हुई ना ? इस लिए धर्म क्षेत्र में कभी भविष्य पे निर्भर न रह के वर्तमान को सुधारना उचित रहेगा। और ऐसे बहोत से लोग हे जो अपने धर्म को अपनी स्थिति से ज़्यादा महत्व देते हे, आइये कुछ उदाहरण देखते हे : –

१. मुंबई नगरी में भारतनगर विस्तार में रहता एक राजस्थानी परिवार – गुरुदेव श्री जयंतसेनसूरीश्वरजी के परम भक्त – पूरे परिवार में रात्रिभोजन त्याग का ऐसा चुस्त नियम पालन हो रहा हे की घर में काम करने वाले आदमी भी उनकी भावना से प्रेरित हो के रोज़ चौविहार करता हे। घर के दो बेटे ऑफिस में ही टिफ़िन मंगवा के रोज चौविहार करते हे, किसी दिन टिफ़िन न आया तो पानी पी के पच्चकखाण ले लेते हे। उनकी ऑफिस में भी ग्राहक के लिए रात्रिभोजन निषेध हे अगर जरूर पड़ती हे तो ग्राहक के लिए भी घर से टिफ़िन मंगवाते हे, और यही बात घर में भी लागु हे – किसी भी मेहमान को रात को खाना नहीं दिया जाता।
२. अहमदाबाद के शेठ श्री भीखाभाई मोरखिया व् परिवार – गुरु भगवंत के एक वचन से ही पुरे परिवार ने चौविहार का नियम ले लिया आजीवन
३. अहमदाबाद का एक लड़का जो रोज शहर से दूर कॉलेज में जाता था पढ़ने जो की उसके घर से करीब ५० की मी दूर होगा फिर भी लौटते समय तीर्थ में चौविहार करता था किसी दिन देरी हो जाये तो भी तीर्थ में जाता और सीधे पच्चखाण ले लेता लेकिन चौविहार करता – रात को पानी भी नहीं पीता था।
४. मुंबई सेन्ट्रल में रहने वाले श्रावक श्री चंदूभाई – जन्म से ही धर्म के संस्कार एकदम मजबूत, खुद चौविहार करते लेकिन मन में एक दिन सोचा की मेरे जैन संघ के युवान लड़के मुंबई में व्यापार के लिए आते हे पर भोजन की योग्य सुविधा न होने से रात को खाते हे तो क्यों ना उनके लिए कुछ करू – यही सोच के उन्होंने अपने ही घर में रोज़ युवानो को चौविहार करने का प्रबंध किया और रोज के करीब ५० युवान को चौविहार करवाने का लाभ लेते थे। यह बहोत बड़ी बात हे – रोज के ५० युवान गिनो तो भी १ महीने के १५०० हुए यानि की १५०० लोगो को रात्रिभोजन के महापाप से बचाया उन्होंने – खूब अनुमोदना।
५. मुंबई में २ पार्टनर – बहोत ही धार्मिक – और स्वधर्मी में धर्म भावना प्रगट करने की अदभुत तरकीब। उनकी ऑफिस में जितने लोग नौकरी करते हो सब को चौविहार करना जरुरी और ऑफिस की और से ही सब के लिए रोज चौविहार का टिफ़िन दिया जाता हे, इतना ही नहीं रोज ऑफिस में धर्म सूत्र पढ़ाने के लिए पंडितजी भी आते हे, ताकि रोज १ घंटा धार्मिक पढाई की जाये – यह भी बहोत बड़ी अनुमोदनीय बात हे।
६. अहमदाबाद का एक लड़का जो जन्म से बिलकुल धार्मिक नहीं – समय का बदलाव हुआ और तपोवन की शिबिर की – गुरुमा श्री चंद्रशेखरविजयजी की वाचना सुनी, मन में परिवर्तन हुआ – चौविहार का नियम लिया लेकिन महीने में ५ दिन की छूट रखी और ५ दिन जरूर रात को खाता। एक दिन और निर्ग्रन्थ मुनीवर से संगत हुई और मुनीवर ने एक ही सवाल पूछा की ५ दिन की छूट रख के क्या फायदा, धर्म करना हे तो सोने जैसा शुद्ध करो, पित्तल के जैसा किस काम का – यह बात सुन के ही उस लड़के ने आजीवन चौविहार, गर्म पानी का नियम ले लिया – जो पिछले ११ सालो से चल रहा हे।
७. मुंबई का एक युवान – रोज चौविहार करने वाला लेकिन हाल ही में मुंबई में डायमंड मार्किट बांद्रा ट्रांसफर होने से काफी चौविहार वाले भी मज़बूरी से रात को खाने लगे हे क्युकी बांद्रा में चौविहार की कोई भी सुविधा नहीं हे और वापिस घर तक आते आते रात हो ही जाती हे – ऐसी स्थिति में भी वह युवान रोज पक्का चौविहार करता हे – थोड़ा नास्ता साथ में रखता हे और अंत में पानी पी के चौविहार करता हे। (मुंबई के मुख्य लोगो से निवेदन हे इसका कुछ रास्ता निकाले, युवाओ को धर्म करना हे तो उनको सहूलियत देना हमारा कर्तव्य हे)
८. अहमदाबाद के रतनपोल विस्तार के एक व्यापारी – चाहे कुछ भी हो चौविहार के समय घर पे जाते ही हे, भले कितना बड़ा ग्राहक बैठा हो, और किसी दिन संजोग से ना जा पाये तो बिना खाए चौविहार कर लेते हे।
९. अहमदाबाद के एक श्रावक जिनका नियम था की वे किसी को रात को खाना नहीं देंगे – एक दिन उनकी बेटी के ससुर आये पर घर में और कोई नहीं था और उन्होंने पानी – नाश्ता का व्यवहार नहीं किया तो बेटी के ससुरजी को गुस्सा आया बहोत खरी खोटी सुनाई फिर भी वे श्रावक शांत रहे और उनको समजाया अपने नियम के बारे में – फिर परिवार वालो ने आ के समजाया तब शांत हुए। यह भी हमारे समाज की विषम स्थिति हे कोई धर्म नहीं करता तो भी उसको सुनना पड़ता हे अगर अच्छे से धर्म करे तब भी उसको ही सुनना पड़ता हे।

और भी बहोत सारे उदाहरण मिल जायेंगे चौविहार के लिए तो –
अब कुछ बाते हे जिनको जानना बहोत जरुरी हे – क्या सिर्फ रात को खाना ही रात्रिभोजन हे ? नहीं, इसके और भी प्रकार हे वो जानते हे :-
१. सब से पहले तो चौविहार के चार भेद बताये गए हे, वो जानिए :-
दिन में बना दिन में खाना, दिन में बना रात को खाना, रात में बना दिन में खाना, रात में बना रात को खाना –
इन ४ भेद में पहला भेद ही हमें कल्पता हे बाकि के ३ भेद सरासर रात्रिभोजन में ही आते हे। रात में बनाया गया खाना दिन में खाए तो वो भी रात्रि भोजन में ही गिना जाता हे क्युकी खाना बनाने की प्रक्रिया में जीव हिंसा होती ही हे – फिर वो चाहे सुख नाश्ता बनाये, सब्जी समारे या गेहू आदि साफ़ करे – ये सब कार्य रात को करना बिलकुल उचित नहीं हे। आज कई जगह बड़े स्वामी वात्सल्य में यह पाप भयंकर फैला हे। कभी संघ नवकारशी हो तो सब केटरर्स को सौप दिया जाता हे और उनको कहा जाता हे की ७.३० बजे तक सब तैयार होना चाहिए, अब सीधी बात हे अगर ७.३० तक नवकारशी आती हे तो १००० लोगो का खाना इतना जल्दी तो तैयार नहीं होगा तो ऐसे में वो लोग सब्जी समार के रखना ऐसे कच्चे काम सुबह ५ बजे से करने लगते हे फिर सूर्योदय होने पर सब आखरी काम चालू और नवकारशी तक सब तैयार और हमें बताया जाता हे की सूर्योदय के बाद की रसोई हे। और पूज्य साधु साध्वीजी भगवंत को भी गलत बोल के वोराया जाता हे – और बाद में नवकारशी करने वाले कुछ लोग तिरछी नजर से मुनी भगवंत को देख के बोलते हे “यह कैसे मुनी हे जो ऐसी गोचरी लेते हे, साधु को ऐसी गोचरी नहीं खपती” – इस तरह बेवजह मुनीवर को बदनाम करते हे। अगर साधु को नहीं खपती ऐसी गोचरी तो हमें क्यों खपे ? तो मूल बात पे रात का कुछ बना हो, साफ़ किया हो वो सब भी दिन में नहीं चलता।

२. खुले आकाश के निचे खाने से सीधा रात्रि भोजन का पाप लगता हे। परमात्मा का वचन हे की कभी खुले आकाश के निचे कुछ खाया पिया न जाये – वह सीधा रात्रिभोजन में कहलाता हे, भले ही दिन हो।

३. एक और महत्वपूर्ण बात हे की चाहे कुछ भी हो जाये कभी सामूहिक रात्रिभोजन का पाप नहीं करना चाहिए। कई बार देखने को मिलता हे की रात को शादिया होती हे उसमे रात्रिभोजन के साथ, घास, बर्फ, डान्स आदि अनेक अनाचार जुड़े हुए होते हे। इसमें शामिल होने से सामूहिक पाप लगता हे जो निकाचित कर्म बंधन में परिवर्तित होने की बहोत ज़्यादा संभावना हे – अनिकाचित कर्म टूट शकते हे लेकिन निकाचित कर्म तोडना बहोत कठिन हे। और सामूहिक पाप जब उदय में आते हे तो भयंकर परिणाम देते हे जैसे की भूकंप, सुनामी, ट्रैन अकस्मात् आदि बड़ी दुर्घटना। अभी कुछ दिन पहले हिमाचल में एक साथ २४ लोग नदी में डूब के मर गए – यह एक उदाहरण हे, उन २४ लोगो ने किसी काल में एक साथ सामूहिक पाप किया होगा जो ऐसे उदय में आया। इसी पाप को समझते हुए मुंबई और गुजरात के लगभग सभी संघ ने निर्णय लिया हे की रात को शादी नहीं होगी और यदि कोई रात को शादी रखेगा तो लोग उसके वहा नहीं जायेंगे – बड़ी अनुमोदनीय बात हे ये। आशा हे मध्य प्रदेश, राजस्थान, साउथ आदि अन्य धर्म भूमि भी इस बात में आगे बढे।

४. एक और महत्वपूर्ण बात हे की कभी कभी हम चौविहार के समय के पश्चात ५ – १० मिनट तक कुछ वजह से खाते हे और फिर चौविहार का पच्चक्खाण लेते हे, यह भी उचित नहीं हे। अतिचार में बोला जाता हे की “लगभग वेला ए वालु कीधु” यानी की चौविहार के समय से ५ मिनट पहले तक भी खाते हे तो अतिचार लगता हे – मतलब अगर चौविहार ६ बजे आते हे तो ५.५५ बजे तक हमारे चौविहार हो जाने चाहिए उसके बाद भी खाने से “लगभग वेला ए वालु कीधु” का अतिचार लगता हे। अब सोचिये जहा ५ मिनट पहले चौविहार कर लेने का बोला गया हे तो समय बीतने के बाद के खाने को चौविहार कैसे कहे ? नहीं, चौविहार का समय बित जाने के बाद १ क्षण पे भी खाना खाया जाये तो वो सीधा रात्रि भोजन में ही गिना जाता हे।

५. जितना मुमकिन हो उतना आप किसी और को रात को खाना देना बंद करे, इसमें उसको रात को खाना खिलाने का दोष आपको भी लगता हे – आप भी इस पाप के समान भागीदार बनोगे। लेकिन यह बात गरीब भिक्षुक और जानवर पे लागु नहीं होती, क्युकी उनकी मज़बूरी हे अज्ञान हे।

तो आप जरूर प्रयत्न कीजिये इस महापाप का त्याग करने का – कच्चे विचार मत रखिये जरूर आप से होगा। परमात्मा के प्रति दिल में श्रद्धा रखोगे तो सब आसान हे – और ये कोई फ़िज़ूल की बाते नहीं हे सच्चे मन से इसको अपना के तो देखो, एक बार धर्म के रंग में रंगा के तो देखो। दुनिया के लिए आप २४ घंटे सोचते हो उसमे से सिर्फ १५ मिनट खुद के लिए सोचो, और यह कार्य सिर्फ सच्ची श्रद्धा से होगा, और सच्ची श्रद्धा सिर्फ सम्यग ज्ञान से ही आएगी। वितराग प्रणीत धर्म के ज्ञान को पढ़ना जरुरी हे, रोज हो शके तो २ लाइन याद कीजिये सूत्र की न हो तो कोई धार्मिक किताब पढ़िए लेकिन ज्ञान ही आपकी सोचने की दिशा को नई राह बताएगा ये बात तय हे।

और अंत में राष्ट्रसंत साहित्यमनीषि श्री जयंतसेनसूरीश्वरजी विरचित रात्रिभोजन त्याग पे एक सुमधुर सज्झाय :-

-: रात्रिभोजन त्याग की सज्झाय :-

ओ रंग रसिया ! जीवन में तुम रात्रिभोजन वारजो ॥
नहीं रात्रिभोजन सुखकारी, हे रात्रिभोजन दुखकारी,
तजो इसको यह नहीं हितकारी …. ओ रंग रसिया ! ॥ १ ॥
ज्ञानी जन यु फरमावे, ये नरक द्वार पर ले जावे,
वहाँ जीव अनंता दुःख पावे …. ओ रंग रसिया ! ॥ २ ॥
यह वैध हकीम भी बतलाये, जो दिन में बना दिन में खावे,
वह निर्मल रोग रहित थावे …. ओ रंग रसिया ! ॥ ३ ॥
नित दान स्नान भोजन करिये, यह सूरज साखे अनुसरिये,
भंडार पुण्य का भवि भरिये …. ओ रंग रसिया ! ॥ ४ ॥
जो रात्रि में खावे भावे, मर कर के रात्रिचर थावे,
सब धर्म ग्रंथ यो फरमावे …. ओ रंग रसिया ! ॥ ५ ॥
प्रभु सूरी राजेन्द्र की है वाणी, तजो रात्रिभोजन भवि प्राणी,
जयंतसेन सफल हो जिंदगानी …. ओ रंग रसिया ! ॥ ६ ॥

वीतराग की आज्ञा के विरुद्ध कुछ बोला गया हो तो त्रिविधे मिच्छामी दुक्कडम

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